baja ki dushman-e-jaan shahr-e-jaan ke baahar hai | बजा कि दुश्मन-ए-जाँ शहर-ए-जाँ के बाहर है

  - Akhtar Hoshiyarpuri
बजाकिदुश्मन-ए-जाँशहर-ए-जाँकेबाहरहै
मगरमैंउसकोकहूँक्याजोघरकेअंदरहै
तमामनक़्शपरिंदोंकीतरहउतरेहैं
किकाग़ज़ोंपेखिलेपानियोंकामंज़रहै
मैंएकशख़्सजोकुम्बोंमेंरहगयाबटकर
मैंमुश्त-ए-ख़ाकजोतक़्सीमहोकेबे-घरहै
शजरकटातोकोईघोंसलाकहींरहा
मगरइकउड़तापरिंदाफ़ज़ाकाज़ेवरहै
वोख़ौफ़हैकिमकींअपनेअपनेकमरोंमेंहैं
वोहालहैकिबयाबाँमेंवुस'अत-ए-दरहै
कहींभीपेड़नहींफिरभीपत्थरआएहैं
गलीमेंकोईनहींफिरभीशोर-ए-महशरहै
मैंइसवसीअजज़ीरेमेंवाहिदइंसाँहूँ
किमेरेचारोंतरफ़दश्तकासमुंदरहै
कोईभीख़्वाबऊँचीफ़सीलसेउतरा
मगरकिरनकेगुज़रनेकोरौज़न-ए-दरहै
तमामरौशनियाँबुझगईहैंबस्तीमें
मगरवोदीपकिजिसकाहवाओंमेंघरहै
किसीसेमुझकोगिलाक्याकिकुछकहूँ'अख़्तर'
किमेरीज़ातहीख़ुदरास्तेकापत्थरहै
  - Akhtar Hoshiyarpuri
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