kya teri muhabbat ke muqaabil nahin hooñ main | क्या तेरी मुहब्बत के मुक़ाबिल नहीं हूँ मैं

  - Prashant Kumar
क्यातेरीमुहब्बतकेमुक़ाबिलनहींहूँमैं
फिरक्यूँकितिरीबज़्ममेंशामिलनहींहूँमैं
वोख़्वाबतुझेचैनसेजीनेनहींदेगा
जिसख़्वाबमेंतेरेकभीशामिलनहींहूँमैं
क्यादिलकीरज़ाहैमुझेजल्दीसेबतादे
कितनोंकोतिरेशहरमेंहासिलनहींहूँमैं
लिख-लिखकेकिताबोंपेमिटायागयामुझको
इकहर्फ़मेंतकइश्क़केशामिलनहींहूँमैं
  - Prashant Kumar
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