main jidhar jaaun udhar duzd-e-kafan dikhta hai | मैं जिधर जाऊँ उधर दुज़्द-ए-कफ़न दिखता है

  - Prashant Kumar
मैंजिधरजाऊँउधरदुज़्द-ए-कफ़नदिखताहै
हरकलेजेमेंपड़ाएकरसनदिखताहै
येतिराजिस्मकिख़ुशबूकाभवनदिखताहै
तेरीआँखोंमेंमुझेनील-गगनदिखताहै
हमहीहालातकेहैंमारेहुएवरनातो
हरकोईअपनीहीमस्तीमेंमगनदिखताहै
कोईमौसमहोपहनतानहींहूँकुछभीमैं
क्यूँँकिलत्तोंमेंमिरापूराबदनदिखताहै
पेप्लमटॉपयाकुछऔरपहनकरआना
सूटसलवारमेंतोसाफ़बदनदिखताहै
ऐसालगताहैवफ़ाकेसभीगुलसूखगए
उजड़ाउजड़ासातिरेदिलकाचमनदिखताहै
जिसेआवाज़लगाताहूँनहींसुनताहै
हरकोईयाँतिरीआँखोंमेंमगनदिखताहै
येजोआगेकानिवालाभीखिलादेतेहैं
इन्हींलोगोंमेंमुझेअपनावतनदिखताहै
  - Prashant Kumar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy