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Abrar Kashif
dard-e-mohabbat dard-e-judai dono ko ik saath mila
dard-e-mohabbat dard-e-judai dono ko ik saath mila | दर्द-ए-मुहब्बत दर्द-ए-जुदाई दोनों को इक साथ मिला
- Abrar Kashif
दर्द-ए-मुहब्बत
दर्द-ए-जुदाई
दोनों
को
इक
साथ
मिला
तू
भी
तन्हा
मैं
भी
तन्हा
आ
इस
बात
पे
हाथ
मिला
- Abrar Kashif
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बदले
मौसम
हालात
यहाँ
है
ख़ुशियों
की
बारात
यहाँ
होली
खेलेंगे
हम
भी
पर
खेलेंगे
तेरे
साथ
यहाँ
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Kaviraj " Madhukar"
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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दिल
बना
दोस्त
तो
क्या
क्या
न
सितम
उस
ने
किए
हम
भी
नादां
थे
निभाते
रहे
नादान
के
साथ
Shakeel Badayuni
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इस
से
पहले
कि
बिछड़
जाएँ
हम
दो
क़दम
और
मिरे
साथ
चलो
मुझ
सा
फिर
कोई
न
आएगा
यहाँ
रोक
लो
मुझको
अगर
रोक
सको
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Nasir Kazmi
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हमेशा
साथ
सबके
तो
ख़ुदा
भी
रह
नहीं
सकता
बनाकर
औरतें
उसने
ज़मीं
को
यूँँ
किया
जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
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क्यूँँ
चलते
चलते
रुक
गए
वीरान
रास्तो
तन्हा
हूँ
आज
मैं
ज़रा
घर
तक
तो
साथ
दो
Adil Mansuri
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जाँ
हम
दोनों
साथ
में
अच्छे
लगते
हैं
देखो
शे'र
मुकम्मल
अच्छा
लगता
है
Neeraj Neer
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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शर्तें
लगाई
जाती
नहीं
दोस्ती
के
साथ
कीजे
मुझे
क़ुबूल
मिरी
हर
कमी
के
साथ
Waseem Barelvi
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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अगर
तुम
हो
तो
घबराने
की
कोई
बात
थोड़ी
है
ज़रा
सी
बूँदा-बाँदी
है
बहुत
बरसात
थोड़ी
है
ये
राह-ए-इश्क़
है
इस
में
क़दम
ऐसे
ही
उठते
हैं
मोहब्बत
सोचने
वालों
के
बस
की
बात
थोड़ी
है
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Abrar Kashif
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दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
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Abrar Kashif
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मंज़िलों
का
कौन
जाने
रहगुज़र
अच्छी
नहीं
उसकी
आँखें
ख़ूब-सूरत
है
नज़र
अच्छी
नहीं
Abrar Kashif
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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दिया
जला
के
सभी
बाम-ओ-दर
में
रखते
हैं
और
एक
हम
हैं
इसे
रह-गुज़र
में
रखते
हैं
समुंदरों
को
भी
मालूम
है
हमारा
मिज़ाज
कि
हम
तो
पहला
क़दम
ही
भँवर
में
रखते
हैं
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Abrar Kashif
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