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Gulshan
tum samandar ki baat karte ho
tum samandar ki baat karte ho | तुम समुंदर की बात करते हो
- Gulshan
तुम
समुंदर
की
बात
करते
हो
यहाँ
आँखों
से
दरिया
बहता
है
- Gulshan
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देख
ज़िंदाँ
से
परे
रंग-ए-चमन
जोश-ए-बहार
रक़्स
करना
है
तो
फिर
पाँव
की
ज़ंजीर
न
देख
Majrooh Sultanpuri
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तुमने
जो
फूल
लेते
में
छू
लीं
हैं
उंगलियाँ
मेरे
बदन
से
आएगी
ख़ुशबू
गुलाब
की
Siddharth Saaz
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आदतन
उसके
लिए
फूल
ख़रीदे
वरना
नहीं
मालूम
वो
इस
बार
यहाँ
है
कि
नहीं
Abbas Tabish
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वक़्त
किस
तेज़ी
से
गुज़रा
रोज़-मर्रा
में
'मुनीर'
आज
कल
होता
गया
और
दिन
हवा
होते
गए
Muneer Niyazi
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ईद
पर
सब
फूल
लेकर
आ
रहे
हैं
हो
गए
हैं
ज़िंदगी
के
ख़त्म
रमज़ान
Aves Sayyad
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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ये
जिस्म
तंग
है
सीने
में
भी
लहू
कम
है
दिल
अब
वो
फूल
है
जिस
में
कि
रंग-ओ-बू
कम
है
Pallav Mishra
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सब
दुखों
का
ये
समुंदर
पार
होगा
जब,
सभी
आफ़तों
के
पत्थरों
पर
नाम
होगा
राम
का
Shoonya Shrey
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बहरस
ख़ारिज
हूँ
ये
मालूम
है
पर
तुम्हारी
ही
ग़ज़ल
का
शे'र
हूँ
Gyan Prakash Akul
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फोन
भी
आया
तो
शिकवे
के
लिए
फूल
भी
भेजा
तो
मुरझाया
हुआ
रास्ते
की
मुश्किलें
तो
जान
लूँ
आता
होगा
उसका
ठुकराया
हुआ
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Balmohan Pandey
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यानी
कोई
कमी
नहीं
मुझ
में
यानी
मुझ
में
कमी
उन्हीं
की
है
Gulshan
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बे-ख़याली
में
हम
भी
कहाँ
आ
गए
छोड़
पीछे
तुम्हारे
जहाँ
आ
गए
अब
बुलाना
नहीं
याद
आना
नहीं
फ़ासले
अब
बहुत
दरमियाँ
आ
गए
अब
कोई
आरज़ू
या
गुज़ारिश
नहीं
मोल
इसका
नहीं
हम
कहाँ
आ
गए
जिस्म
की
हद
के
बाहर
निकल
कर
जहाँ
रूह
रौशन
हुई
हम
वहाँ
आ
गए
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Gulshan
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ख़ुद
से
नाराज़
ज़माने
से
ख़फ़ा
रहते
हैं
जाने
क्या
सोच
के
हम
सब
से
जुदा
रहते
हैं
Gulshan
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ज़ीस्त
से
बेज़ार
था
सो
मर
गया
बेसबब
किरदार
था
सो
मर
गया
झूठा
वो
इक़रार
था
सो
मर
गया
नाम
का
बस
प्यार
था
सो
मर
गया
जान
माँगी
थी
किसी
ने
प्यार
से
आदमी
दिलदार
था
सो
मर
गया
नफ़रतों
का
खेल
जो
रचता
था
वो
ज़ेहन
से
बीमार
था
सो
मर
गया
बे-वफ़ा
दुनिया
से
रखना
ज़ीस्त
में
आसरा
बेकार
था
सो
मर
गया
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Gulshan
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बे-सबब
मुस्कुराना
ज़रूरी
नहीं
इस
तरह
ग़म
छुपाना
ज़रूरी
नहीं
आँख
में
गर
समुन्दर
बनें
तो
बनें
आँसुओं
को
बहाना
ज़रूरी
नहीं
कौन
है
जो
तुम्हारी
कहानी
सुने
ग़म
सभी
को
दिखाना
ज़रूरी
नहीं
तुम
सफ़र
में
अकेले
चलोगे
यहाँ
साथ
देगा
ज़माना
ज़रूरी
नहीं
बर्क़
गिरती
रहेगी
चमन
में
मगर
ख़ाक
हो
आशियाना
ज़रूरी
नहीं
तीर
भी
अब
चलें
कुछ
नए
ढंग
से
चूक
जाए
निशाना
ज़रूरी
नहीं
हस्ब-ए-मामूल
उसने
है
वा'दा
किया
उसका
वा'दा
निभाना
ज़रूरी
नहीं
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Gulshan
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