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Subodh Sharma "Subh"
haan nahin taqdeer men to kya hua hai
haan nahin taqdeer men to kya hua hai | हाँ नहीं तक़दीर में तो क्या हुआ है
- Subodh Sharma "Subh"
हाँ
नहीं
तक़दीर
में
तो
क्या
हुआ
है
पर
हमेशा
दिल
में
तेरा
'शुभ'
रहेगा
- Subodh Sharma "Subh"
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ज़िंदगी
भर
के
लिए
दिल
पे
निशानी
पड़
जाए
बात
ऐसी
न
लिखो,
लिख
के
मिटानी
पड़
जाए
Aadil Rasheed
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इतनी
सारी
यादों
के
होते
भी
जब
दिल
में
वीरानी
होती
है
तो
हैरानी
होती
है
Afzal Khan
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शक
है
तुझे
अगर
ये
अब
भी
गुदाज़
है
दिल
तो
सीने
से
कभी
ये
पत्थर
निकाल
मेरा
Abhay Aadiv
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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दिल
गया
रौनक़-ए-हयात
गई
ग़म
गया
सारी
काएनात
गई
Jigar Moradabadi
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दोस्त
ने
दिल
को
तोड़
के
नक़्श-ए-वफ़ा
मिटा
दिया
समझे
थे
हम
जिसे
ख़लील
काबा
उसी
ने
ढा
दिया
Arzoo Lakhnavi
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दिल
आज
शाम
से
ही
उसे
ढूँडने
लगा
कल
जिस
के
बा'द
कमरे
में
तन्हाई
आई
थी
Ammar Iqbal
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झुकी
झुकी
सी
नज़र
बे-क़रार
है
कि
नहीं
दबा
दबा
सा
सही
दिल
में
प्यार
है
कि
नहीं
Kaifi Azmi
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हर
रोज़
रोज़
दिल
में
नया
ग़म
लिए
हुए
बैठे
हुए
हैं
रौशनी
मद्धम
किए
हुए
रोते
हुए
का
हाथ
बटाना
नहीं
कभी
कहना
उसे
कि
हम
भी
ये
आलम
जिए
हुए
साबित
किया
था
हमने
मोहब्बत
को
बे-वफ़ा
कपड़े
उतार
कर
के
थे
परचम
सिए
हुए
जितनी
चढ़ी
हैं
आज
मज़ारों
पे
चादरें
उतने
गुनाह
इश्क़
में
हैं
हम
किए
हुए
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Subodh Sharma "Subh"
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सर्द
का
मौसम
था
वो
अपने
गाँव
से
चलकर
आती
थी
उसके
बालों
पलकों
पे
गिर
के
शबनम
इठलाती
थी
बुशरा
लहजा
गाल
गुलाबी
और
बहुत
कुछ
था
लेकिन
सब
सेे
ज़्यादा
मुझको
उसकी
भूरी
आँखें
भाती
थी
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Subodh Sharma "Subh"
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वो
जिसे
जाना
नहीं
था
जा
चुका
है
कारवाँ
से
क्या
मुझे
चलता
रहेगा
Subodh Sharma "Subh"
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आदमी
को
आदमी
खलता
रहेगा
उम्र-भर
ये
सिलसिला
चलता
रहेगा
रौशनी
का
काम
सब
अंधे
करेंगे
हाथ
पर
सबके
दिया
जलता
रहेगा
वो
मिलेगा
एक
दिन
इस
राह
पे
तू
यार
कब-तक
इस
तरह
चलता
रहेगा
लोग
जो
कहते
नहीं
हैं
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
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Subodh Sharma "Subh"
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उसी
का
अक्स
है
इस
कहकशाँ
में
वगरना
क्या
मैं
तकता
आसमाँ
में
करिश्मा
है
अजब
है
इश्क़
में
जो
बदन
ज़िंदा
रहे
दो
एक
जाँ
में
मुयस्सर
था
नहीं
साहिल
हमें
वो
बहा
कर
ले
गया
अपनी
रवाँ
में
अगरचे
एक
होता
तो
मैं
कहता
बहुत
से
ऐब
थे
उस
बद-गुमाँ
में
उतर
आए
बग़ावत
पर
ख़ुदा
भी
हमारी
कौन
सुनता
दो-जहाँ
में
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Subodh Sharma "Subh"
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