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Subodh Sharma "Subh"
vo jise jaana nahin tha ja chuka hai
vo jise jaana nahin tha ja chuka hai | वो जिसे जाना नहीं था जा चुका है
- Subodh Sharma "Subh"
वो
जिसे
जाना
नहीं
था
जा
चुका
है
कारवाँ
से
क्या
मुझे
चलता
रहेगा
- Subodh Sharma "Subh"
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हर
सम्त
है
ख़ुदा
वो
किसी
से
जुदा
नहीं
गालिब
नज़र
से
पी
है
नज़र
में
ख़ुदा
नहीं
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हाथ
सर
पे
रख
रहे
गुस्ताख़
ख़ाली
जल
गया
जब
सब
बची
है
राख़
ख़ाली
इन
ठिकानों
पर
भला
अब
कौन
चहके
सब
परिंदे
उड़
गए
हैं
शाख़
ख़ाली
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सभी
कुछ
हाथ
हो
के
दर-बदर
है
तेरे
ता'वीज़
का
ये
सब
असर
है
हसीं
सीरत
पे
ये
बेचैन
आँखें
चटकती
धूप
सहरा
में
शजर
है
बने
अर्जुन
यहाँ
कितने
हैं
बैठे
कहाँ
पर
ये
कहाँ
इनकी
नज़र
है
नहीं
रोना
किसी
दुख
पर
मुझे
'शुभ'
जो
होना
है
वही
होना
अगर
है
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तू
बता
कैसे
मैं
ख़ुद
को
इस
तरह
से
बाँट
लूँ
एक
चुनना
है
मुझे
फिर
क्यूँ
दहाई
छाँट
लूँ
वो
गले
लगकर
मुझे
रोता
है
'शुभ'
हर
बार
तो
पहले
ग़ुस्सा
कर
चुका
हूँ
अब
ज़रा
सा
डाँट
लूँ
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सर्द
का
मौसम
था
वो
अपने
गाँव
से
चलकर
आती
थी
उसके
बालों
पलकों
पे
गिर
के
शबनम
इठलाती
थी
बुशरा
लहजा
गाल
गुलाबी
और
बहुत
कुछ
था
लेकिन
सब
सेे
ज़्यादा
मुझको
उसकी
भूरी
आँखें
भाती
थी
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