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Subodh Sharma "Subh"
sabhi kuchh haath ho ke dar-badar hai
sabhi kuchh haath ho ke dar-badar hai | सभी कुछ हाथ हो के दर-बदर है
- Subodh Sharma "Subh"
सभी
कुछ
हाथ
हो
के
दर-बदर
है
तेरे
ता'वीज़
का
ये
सब
असर
है
हसीं
सीरत
पे
ये
बेचैन
आँखें
चटकती
धूप
सहरा
में
शजर
है
बने
अर्जुन
यहाँ
कितने
हैं
बैठे
कहाँ
पर
ये
कहाँ
इनकी
नज़र
है
नहीं
रोना
किसी
दुख
पर
मुझे
'शुभ'
जो
होना
है
वही
होना
अगर
है
- Subodh Sharma "Subh"
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मुँह
ज़र्द-ओ-आह-ए-सर्द
ओ
लब-ए-ख़ुश्क
ओ
चश्म-ए-तर
सच्ची
जो
दिल-लगी
है
तो
क्या
क्या
गवाह
है
Nazeer Akbarabadi
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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ले
दे
के
अपने
पास
फ़क़त
इक
नज़र
तो
है
क्यूँँ
देखें
ज़िंदगी
को
किसी
की
नज़र
से
हम
Sahir Ludhianvi
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कबूतर
इश्क़
का
उतरे
तो
कैसे?
तुम्हारी
छत
पे
निगरानी
बहुत
है
इरादा
कर
लिया
गर
ख़ुद-कुशी
का
तो
ख़ुद
की
आँख
का
पानी
बहुत
है
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Kumar Vishwas
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निगाह-ए-शोख़
का
क़ैदी
नहीं
है
कौन
यहाँ
किसे
तमन्ना
नहीं
फूल
चूमने
को
मिले
Aks samastipuri
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मैंने
बस
इतना
पूछा
था
क्या
देखते
हो
भला
मैंने
ये
कब
कहा
था
मुझे
देखना
छोड़
दो
गीली
मिट्टी
की
ख़ुशबू
मुझे
सोने
देती
नहीं
मेरे
बालों
में
तुम
उँगलियाँ
फेरना
छोड़
दो
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Tajdeed Qaiser
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मंज़िलों
का
कौन
जाने
रहगुज़र
अच्छी
नहीं
उसकी
आँखें
ख़ूब-सूरत
है
नज़र
अच्छी
नहीं
Abrar Kashif
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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आँख
भर
आई
किसी
से
जो
मुलाक़ात
हुई
ख़ुश्क
मौसम
था
मगर
टूट
के
बरसात
हुई
Manzar Bhopali
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वो
हुस्न
था
शराब
जो
वाजिब
हुआ
नहीं
कहने
के
बावजूद
भी
मैंने
छुआ
नहीं
हासिल
नहीं
हुआ
वो
तो
हमने
भी
उम्र
ये
सज्दे
में
काट
दी
है
मगर
की
दु'आ
नहीं
लगने
लगें
जो
दाग़
परीज़ाद
तुम
पे
तो
कहना
हमारे
बीच
में
कुछ
भी
हुआ
नहीं
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Subodh Sharma "Subh"
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चल
दिया
पलट
के
मैं
घर
ख़ुमार
बाक़ी
है
कुछ
सुधार
है
मुझ
में
कुछ
सुधार
बाक़ी
है
साथ
जो
मेरे
था,
मैं
क़र्ज़-दार
सबका
हूँ
शुक्र
है
ख़ुदा
मुझपे
इक
उधार
बाक़ी
है
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Subodh Sharma "Subh"
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तू
बता
कैसे
मैं
ख़ुद
को
इस
तरह
से
बाँट
लूँ
एक
चुनना
है
मुझे
फिर
क्यूँ
दहाई
छाँट
लूँ
वो
गले
लगकर
मुझे
रोता
है
'शुभ'
हर
बार
तो
पहले
ग़ुस्सा
कर
चुका
हूँ
अब
ज़रा
सा
डाँट
लूँ
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Subodh Sharma "Subh"
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ये
परचम
इश्क़
का
वो
धर
चुका
था
मोहब्बत
थी
हमें
वो
कर
चुका
था
मिला
था
जब
मुझे
पहले-पहल
वो
मियाँ
मैं
तो
उसी
दिन
मर
चुका
था
ग़ज़ल
के
वास्ते
फिर
से
उठाई
वगरना
मैं
क़लम
तो
धर
चुका
था
लिखा
था
ज़िंदगी
पर
उस
सेे
पहले
मोहब्बत
का
मैं
कालम
भर
चुका
था
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Subodh Sharma "Subh"
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रात
हम
सेे
न
बसर
की
जाए
आँख
ये
मुझ'से
उधर
की
जाए
देख
लो
हाल
मेरा
सोचो
फिर
अब
कहीं
और
नज़र
की
जाए
चुप
है,
कुछ
बोल,बता
जो
भी
हो
बात
उसकी
न
मगर
की
जाए
एक
बोतल
कि
बची
है
कल
से
अब
चलो
शाम
बसर
की
जाए
था
मैं
बद-नाम
मगर
पहले
था
अब
तो
उँगली
न
इधर
की
जाए
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Subodh Sharma "Subh"
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