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Subodh Sharma "Subh"
chal diya palat ke main ghar khumaar baaki hai
chal diya palat ke main ghar khumaar baaki hai | चल दिया पलट के मैं घर ख़ुमार बाक़ी है
- Subodh Sharma "Subh"
चल
दिया
पलट
के
मैं
घर
ख़ुमार
बाक़ी
है
कुछ
सुधार
है
मुझ
में
कुछ
सुधार
बाक़ी
है
साथ
जो
मेरे
था,
मैं
क़र्ज़-दार
सबका
हूँ
शुक्र
है
ख़ुदा
मुझपे
इक
उधार
बाक़ी
है
- Subodh Sharma "Subh"
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बाक़ी
न
दिल
में
कोई
भी
या
रब
हवस
रहे
चौदह
बरस
के
सिन
में
वो
लाखों
बरस
रहे
Ameer Minai
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हम
नहीं
वो
जो
करें
ख़ून
का
दावा
तुझ
पर
बल्कि
पूछेगा
ख़ुदा
भी
तो
मुकर
जाएँगे
Sheikh Ibrahim Zauq
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सर
झुकाओगे
तो
पत्थर
देवता
हो
जाएगा
इतना
मत
चाहो
उसे
वो
बे-वफ़ा
हो
जाएगा
Bashir Badr
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गुनाहगार
को
इतना
पता
तो
होता
है
जहाँ
कोई
नहीं
होता
ख़ुदा
तो
होता
है
Waseem Barelvi
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ऐ
आसमान
तेरे
ख़ुदा
का
नहीं
है
ख़ौफ़
डरते
हैं
ऐ
ज़मीन
तेरे
आदमी
से
हम
Unknown
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के
'हैलो'
सुनते
ही
कट
कर
दिया
है
उसने
मेरा
फ़ोन
ख़ुदा
का
शुक्र
है
आवाज़
तो
पहचानता
है
वो
Zubair Ali Tabish
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हमेशा
साथ
सबके
तो
ख़ुदा
भी
रह
नहीं
सकता
बनाकर
औरतें
उसने
ज़मीं
को
यूँँ
किया
जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
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देवताओं
का
ख़ुदास
होगा
काम
आदमी
को
आदमी
दरकार
है
Firaq Gorakhpuri
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जिस
ने
इस
दौर
के
इंसान
किए
हैं
पैदा
वही
मेरा
भी
ख़ुदा
हो
मुझे
मंज़ूर
नहीं
Hafeez Jalandhari
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कहा
था
क्या
और
क्या
बने
हो
अजब
सा
इक
मसअला
बने
हो
हमारी
मर्ज़ी
कहाँ
थी
शामिल
तुम
अपने
मन
से
ख़ुदा
बने
हो
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Ritesh Rajwada
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थाम
लो
हाथ
किधर
जाऊँगा
टूट
पाया
तो
बिखर
जाऊँगा
ये
मेरा
डर
है
कि
तेरे
दिल
से
मैं
किसी
दिन
को
उतर
जाऊँगा
इक
नज़र
फेर
मेरी
और
ज़रा
देख
मैं
कल
से
सुधर
जाऊँगा
इश्क़
में
हद
तो
नहीं
होती
पर
एक
दिन
हद
से
गुज़र
जाऊँगा
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Subodh Sharma "Subh"
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दीप
फिर
से
ये
जगमगाए
हैं
राम
जी
वन
से
लौट
आए
हैं
आज
कोई
नहीं
निभा
पाता
राम
ने
सब
वचन
निभाए
हैं
जाति
पे
तंज़
कसने
वालों
से
पूछना
बेर
किसने
खाए
हैं
राम
के
दिल
में
हैं
बसी
सीता
राम
को
दिल
में
हम
बसाए
हैं
पैर
अंगद
सा
शीश
को
कर
के
राम
के
दर
पे
हम
जमाए
हैं
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Subodh Sharma "Subh"
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मक़ाम-ए-दिल
में
दर्जा
दो
दफ़ा
हासिल
नहीं
होता
मेरी
उँगली
कमल
पर
है
मगर
ये
दिल
नहीं
होता
पढ़ाई
छोड़
कर
मैं
लौट
आया
गाँव
को
अपने
फ़क़त
डिग्री
से
अब
कुछ
भी
कहीं
हासिल
नहीं
होता
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Subodh Sharma "Subh"
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इक
नज़र
देख'ने
की
ज़िद
पे
अड़े
होते
हैं
उँगलियाँ
छोड़
के
शानों
पे
खड़े
होते
हैं
देख
कर
रोज़
यही
सोच'ता
हूँ
जूतों
को
बाप
के
पाँव
क्यूँँ
इत'ने
बड़े
होते
हैं
कौन
हासिल
है
मुझे
कौन
मेरा
अपना
है
फ़ैसले
सब
ये
नसीबों
पे
पड़े
होते
हैं
उम्र
तो
बीत
ही
जानी
है
इसे
भरने
में
बख़्त
की
मार
के
भी
घाव
बड़े
होते
हैं
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Subodh Sharma "Subh"
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आदमी
को
आदमी
खलता
रहेगा
उम्र-भर
ये
सिलसिला
चलता
रहेगा
रौशनी
का
काम
सब
अंधे
करेंगे
हाथ
पर
सबके
दिया
जलता
रहेगा
वो
मिलेगा
एक
दिन
इस
राह
पे
तू
यार
कब-तक
इस
तरह
चलता
रहेगा
लोग
जो
कहते
नहीं
हैं
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
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Subodh Sharma "Subh"
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