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Subodh Sharma "Subh"
ik nazar dekh'ne ki zid pe arde hote hain
ik nazar dekh'ne ki zid pe arde hote hain | इक नज़र देख'ने की ज़िद पे अड़े होते हैं
- Subodh Sharma "Subh"
इक
नज़र
देख'ने
की
ज़िद
पे
अड़े
होते
हैं
उँगलियाँ
छोड़
के
शानों
पे
खड़े
होते
हैं
देख
कर
रोज़
यही
सोच'ता
हूँ
जूतों
को
बाप
के
पाँव
क्यूँँ
इत'ने
बड़े
होते
हैं
कौन
हासिल
है
मुझे
कौन
मेरा
अपना
है
फ़ैसले
सब
ये
नसीबों
पे
पड़े
होते
हैं
उम्र
तो
बीत
ही
जानी
है
इसे
भरने
में
बख़्त
की
मार
के
भी
घाव
बड़े
होते
हैं
- Subodh Sharma "Subh"
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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मुक़ाबिल
फ़ासलों
से
ही
मोहब्बत
डूब
जाएगी
सुनोगी
झूठी
बातें
तुम
हक़ीक़त
डूब
जाएगी
चलेगी
तब
तलक
जब
तक
तिरी
परछाईं
देखेगी
तिरा
जब
हुस्न
देखेगी
सियासत
डूब
जाएगी
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Anurag Pandey
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जो
बिस्मिल
बना
दे
वो
क़ातिल
तबस्सुम
जो
क़ातिल
बना
दे
वो
दिलकश
नज़ारा
मोहब्बत
का
भी
खेल
नाज़ुक
है
कितना
नज़र
मिल
गई
आप
जीते
मैं
हारा
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Nushur Wahidi
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न
करो
बहस
हार
जाओगी
हुस्न
इतनी
बड़ी
दलील
नहीं
Jaun Elia
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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उतर
गया
है
चेहरा
तेरे
जाने
से
लॉक
नहीं
खुलता
है
अब
मोबाइल
का
Tanoj Dadhich
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नदी
आँखें
भँवर
ज़ुल्फ़ें
कहाँ
तैरूँ
कहाँ
डूबूँ
कि
तेरे
शहर
में
सब
की
अदाएँ
एक
जैसी
हैं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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उसी
के
चेहरे
पे
आँखें
हमारी
रह
जाएँ
किसी
को
इतना
भी
क्या
देखना
ज़रूरी
है
Jyoti Azad Khatri
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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दोनों
को
मिली
है
इक
उम्मीद
मुबारक
हो
तुम
सर्द
का
मौसम
हम
ख़ुर्शीद
मुबारक
हो
है
एक
ख़ुदा
जैसे
वैसे
ही
है
मेरा
दिल
मानिंद
उसी
के
मैं
तौहीद
मुबारक
हो
कुछ
देर
यहाँ
बैठो
वो
चाँद
झुलस
जाए
फिर
ख़ुद
ही
कहे
ख़ुद
से
ये
दीद
मुबारक
हो
जिसको
भी
मिलो
हँसके
ये
एक
हिदायत
दो
गुड़िया
ये
उसे
कहना
तुम
ईद
मुबारक
हो
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हर
रोज़
रोज़
दिल
में
नया
ग़म
लिए
हुए
बैठे
हुए
हैं
रौशनी
मद्धम
किए
हुए
रोते
हुए
का
हाथ
बटाना
नहीं
कभी
कहना
उसे
कि
हम
भी
ये
आलम
जिए
हुए
साबित
किया
था
हमने
मोहब्बत
को
बे-वफ़ा
कपड़े
उतार
कर
के
थे
परचम
सिए
हुए
जितनी
चढ़ी
हैं
आज
मज़ारों
पे
चादरें
उतने
गुनाह
इश्क़
में
हैं
हम
किए
हुए
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जीतने
का
शौक़
था
पर
मात
खानी
पड़
गई
इश्क़
शेर-ओ-शाइरी
में
जब
ज़बानी
पड़
गई
याद
से
हमने
तेरी
हर
इक
निशानी
दूर
की
इक
घड़ी
थी
हाथ
में
जिसकी
निशानी
पड़
गई
आज
जब
वो
लौटकर
आया
हमारी
मौत
पर
लग
रहा
कम
एक
दिन
की
ज़िंदगानी
पड़
गई
वो
मुझे
दुनिया
कहा
करता
उसे
फिर
एक
दिन
मुझको
आख़िर-कार
दुनिया
ही
दिखानी
पड़
गई
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उसी
का
अक्स
है
इस
कहकशाँ
में
वगरना
क्या
मैं
तकता
आसमाँ
में
करिश्मा
है
अजब
है
इश्क़
में
जो
बदन
ज़िंदा
रहे
दो
एक
जाँ
में
मुयस्सर
था
नहीं
साहिल
हमें
वो
बहा
कर
ले
गया
अपनी
रवाँ
में
अगरचे
एक
होता
तो
मैं
कहता
बहुत
से
ऐब
थे
उस
बद-गुमाँ
में
उतर
आए
बग़ावत
पर
ख़ुदा
भी
हमारी
कौन
सुनता
दो-जहाँ
में
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मैं
यही
देख
रहा
था
कि
सड़क
जाती
है
फिर
वही
राह
मुसाफ़िर
में
भटक
जाती
है
इसलिए
हमने
उसे
दूर
किया
है
ख़ुद
से
जान
पहचान
मोहब्बत
के
तलक
जाती
है
मैं
नज़र
फेर
के
जाऊँ
तो
कहाँ
जाऊँगा
ज़ुल्फ़
से
हट
के
ये
झुमके
पे
अटक
जाती
है
ख़्वाब
महताब-जबीं
तख़्त-नशीं
वालों
के
हम
फ़क़ीरों
को
वही
रात
खटक
जाती
है
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Subodh Sharma "Subh"
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