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Subodh Sharma "Subh"
main yahii dekh raha tha ki sadak jaati hai
main yahii dekh raha tha ki sadak jaati hai | मैं यही देख रहा था कि सड़क जाती है
- Subodh Sharma "Subh"
मैं
यही
देख
रहा
था
कि
सड़क
जाती
है
फिर
वही
राह
मुसाफ़िर
में
भटक
जाती
है
इसलिए
हमने
उसे
दूर
किया
है
ख़ुद
से
जान
पहचान
मोहब्बत
के
तलक
जाती
है
मैं
नज़र
फेर
के
जाऊँ
तो
कहाँ
जाऊँगा
ज़ुल्फ़
से
हट
के
ये
झुमके
पे
अटक
जाती
है
ख़्वाब
महताब-जबीं
तख़्त-नशीं
वालों
के
हम
फ़क़ीरों
को
वही
रात
खटक
जाती
है
- Subodh Sharma "Subh"
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ये
कहना
था
उन
से
मोहब्बत
है
मुझ
को
ये
कहने
में
मुझ
को
ज़माने
लगे
हैं
Khumar Barabankvi
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मुहब्बत
में
पड़ा
है
एक
जोगी
वो
लड़की
अप्सरा
जैसी
ही
होगी
बने
हम
राम
होगी
रामलीला
बताओ
तुम
वहाँ
सीता
बनोगी
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Vishnu virat
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तुम्हारा
नाम
लिया
था
कभी
मोहब्बत
से
मिठास
उस
की
अभी
तक
मेरी
ज़बान
में
है
Abbas Dana
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दिल
जिसका
मोहब्बत
में
गिरफ़्तार
रहा
है
वो
मेरी
मदद
के
लिए
तैयार
रहा
है
आग़ाज़-ए-मोहब्बत
का
फ़साना
भी
था
दिलचस्प
बर्बादी
का
क़िस्सा
भी
मज़ेदार
रहा
है
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Obaid Azam Azmi
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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लिखी
होगी
मोहब्बत
जिन
सफ़ों
पर
मेरा
दावा
है
वो
नम
ही
मिलेंगे
किसी
दिन
ऊब
जाओगे
सभी
से
तुम्हें
उस
रोज़
फिर
हम
ही
मिलेंगे
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Ritesh Rajwada
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ये
मोहब्बत
भी
किन
दिनों
में
हुई
दिल
मिलाने
थे
हाथ
से
भी
गए
Kafeel Rana
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सँभलने
के
लिए
कर
ली
मुहब्बत
मगर
इस
में
फिसलना
चाहिए
था
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Divy Kamaldhwaj
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जता
दिया
कि
मोहब्बत
में
ग़म
भी
होते
हैं
दिया
गुलाब
तो
काँटे
भी
थे
गुलाब
के
साथ
Rehman Faris
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मुहब्बत
उठ
गई
दोनों
घरों
से
सुना
है
एक
ख़त
पकड़ा
गया
है
Anjum Ludhianvi
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लोग
जो
कहते
नहीं
है
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
Subodh Sharma "Subh"
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रात
हम
सेे
न
बसर
की
जाए
आँख
ये
मुझ'से
उधर
की
जाए
देख
लो
हाल
मेरा
सोचो
फिर
अब
कहीं
और
नज़र
की
जाए
चुप
है,
कुछ
बोल,बता
जो
भी
हो
बात
उसकी
न
मगर
की
जाए
एक
बोतल
कि
बची
है
कल
से
अब
चलो
शाम
बसर
की
जाए
था
मैं
बद-नाम
मगर
पहले
था
अब
तो
उँगली
न
इधर
की
जाए
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Subodh Sharma "Subh"
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न
रस्ता
है
न
कोई
घर
यहाँ
पे
मुझे
छोड़ा
तो
छोड़ा
है
कहाँ
पे
क़सम
कितनी
मैं
देता
और
वादे
सभी
कुछ
बे-असर
था
हम-रहाँ
पे
बिछड़ते
वक़्त
उस
ने
ये
कहा
था
मिलेंगे
हम
तुझे
अब
दो-जहाँ
पे
ग़ज़ल
की
सूरतें
ही
और
होतीं
अगरचे
आज
वो
होता
यहाँ
पे
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Subodh Sharma "Subh"
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चल
दिया
पलट
के
मैं
घर
ख़ुमार
बाक़ी
है
कुछ
सुधार
है
मुझ
में
कुछ
सुधार
बाक़ी
है
साथ
जो
मेरे
था,
मैं
क़र्ज़-दार
सबका
हूँ
शुक्र
है
ख़ुदा
मुझपे
इक
उधार
बाक़ी
है
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Subodh Sharma "Subh"
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कुछ
देर
यहाँ
बैठो
वो
चाँद
झुलस
जाए
फिर
ख़ुद
ही
कहे
ख़ुद
से
ये
दीद
मुबारक
हो
जिसको
भी
मिलो
हँसके
ये
एक
हिदायत
दो
गुड़िया
ये
उसे
कहना
तुम
ईद
मुबारक
हो
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Subodh Sharma "Subh"
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