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Subodh Sharma "Subh"
na rastaa hai na koi ghar yahaañ pe
na rastaa hai na koi ghar yahaañ pe | न रस्ता है न कोई घर यहाँ पे
- Subodh Sharma "Subh"
न
रस्ता
है
न
कोई
घर
यहाँ
पे
मुझे
छोड़ा
तो
छोड़ा
है
कहाँ
पे
क़सम
कितनी
मैं
देता
और
वादे
सभी
कुछ
बे-असर
था
हम-रहाँ
पे
बिछड़ते
वक़्त
उस
ने
ये
कहा
था
मिलेंगे
हम
तुझे
अब
दो-जहाँ
पे
ग़ज़ल
की
सूरतें
ही
और
होतीं
अगरचे
आज
वो
होता
यहाँ
पे
- Subodh Sharma "Subh"
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सियाह
रात
नहीं
लेती
नाम
ढलने
का
यही
तो
वक़्त
है
सूरज
तिरे
निकलने
का
Shahryar
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उस
वक़्त
का
हिसाब
क्या
दूँ
जो
तेरे
बग़ैर
कट
गया
है
Ahmad Nadeem Qasmi
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था
इंतिज़ार
मनाएँगे
मिल
के
दीवाली
न
तुम
ही
लौट
के
आए
न
वक़्त-ए-शाम
हुआ
Aanis Moin
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बैठे
हैं
चैन
से
कहीं
जाना
तो
है
नहीं
हम
बे-घरों
का
कोई
ठिकाना
तो
है
नहीं
तुम
भी
हो
बीते
वक़्त
के
मानिंद
हू-ब-हू
तुम
ने
भी
याद
आना
है
आना
तो
है
नहीं
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Rehman Faris
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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आज
भी
'प्रेम'
के
और
'कृष्ण'
के
अफ़्साने
हैं
आज
भी
वक़्त
की
जम्हूरी
ज़बाँ
है
उर्दू
Ata Abidi
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अब
उस
सेे
दोस्ती
है
जिस
सेे
कल
मुहब्बत
थी
अब
इस
सेे
ज़्यादा
बुरा
वक़्त
कुछ
नहीं
है
दोस्त
Vishal Singh Tabish
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उस
ने
इस
तरह
से
बदला
है
रवय्या
अपना
पूछना
पड़ता
है
हर
वक़्त,
तुम्हीं
हो
ना
दोस्त?
Inaam Azmi
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वक़्त
रहता
नहीं
कहीं
टिक
कर
आदत
इस
की
भी
आदमी
सी
है
Gulzar
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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चल
दिया
पलट
के
मैं
घर
ख़ुमार
बाक़ी
है
कुछ
सुधार
है
मुझ
में
कुछ
सुधार
बाक़ी
है
साथ
जो
मेरे
था,
मैं
क़र्ज़-दार
सबका
हूँ
शुक्र
है
ख़ुदा
मुझपे
इक
उधार
बाक़ी
है
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Subodh Sharma "Subh"
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हर
सम्त
है
ख़ुदा
वो
किसी
से
जुदा
नहीं
गालिब
नज़र
से
पी
है
नज़र
में
ख़ुदा
नहीं
Subodh Sharma "Subh"
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लोग
जो
कहते
नहीं
है
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
Subodh Sharma "Subh"
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मैं
यही
देख
रहा
था
कि
सड़क
जाती
है
फिर
वही
राह
मुसाफ़िर
में
भटक
जाती
है
इसलिए
हमने
उसे
दूर
किया
है
ख़ुद
से
जान
पहचान
मोहब्बत
के
तलक
जाती
है
मैं
नज़र
फेर
के
जाऊँ
तो
कहाँ
जाऊँगा
ज़ुल्फ़
से
हट
के
ये
झुमके
पे
अटक
जाती
है
ख़्वाब
महताब-जबीं
तख़्त-नशीं
वालों
के
हम
फ़क़ीरों
को
वही
रात
खटक
जाती
है
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Subodh Sharma "Subh"
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तुम
हो
ज़ोया
इश्क़
मेरा
इस
बनारस
की
तरह
पर
मैं
कुंदन
तो
नहीं
हूँ
जो
कलाई
काट
लूँ
Subodh Sharma "Subh"
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