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Subodh Sharma "Subh"
kuchh der yahaañ baitho vo chaand jhuls jaa.e
kuchh der yahaañ baitho vo chaand jhuls jaa.e | कुछ देर यहाँ बैठो वो चाँद झुलस जाए
- Subodh Sharma "Subh"
कुछ
देर
यहाँ
बैठो
वो
चाँद
झुलस
जाए
फिर
ख़ुद
ही
कहे
ख़ुद
से
ये
दीद
मुबारक
हो
जिसको
भी
मिलो
हँसके
ये
एक
हिदायत
दो
गुड़िया
ये
उसे
कहना
तुम
ईद
मुबारक
हो
- Subodh Sharma "Subh"
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हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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क्या
पता
था
देखना
उस
की
तरफ़
हादसा
इतना
बड़ा
हो
जाएगा
Anwar Shaoor
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तू
है
इक़
सुर्ख़
लाल
जोड़े
में
और
क़फ़न
में
पड़े
हुए
हैं
हम
बस
तेरी
एक
दीद
के
ख़ातिर
देख
कब
से
खड़े
हुए
है
हम
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Shadab Asghar
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मैंने
बस
इतना
पूछा
था
क्या
देखते
हो
भला
मैंने
ये
कब
कहा
था
मुझे
देखना
छोड़
दो
गीली
मिट्टी
की
ख़ुशबू
मुझे
सोने
देती
नहीं
मेरे
बालों
में
तुम
उँगलियाँ
फेरना
छोड़
दो
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Tajdeed Qaiser
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सलीक़ा
तो
नहीं
मालूम
हम
को
दीद
का
लेकिन
झुकाती
है
नज़र
को
जब
नज़र
भर
देखते
हैं
हम
Sandeep dabral 'sendy'
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हमें
दीदार
से
मरहूम
रखकर
है
नज़र
दिल
पर
पराया
माल
ताको
और
दौलत
अपनी
रहने
दो
Dagh Dehlvi
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यूँँ
बिछड़ना
भी
बहुत
आसाँ
न
था
उस
से
मगर
जाते
जाते
उस
का
वो
मुड़
कर
दोबारा
देखना
Parveen Shakir
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जिस
की
हर
शाख़
पे
राधाएँ
मचलती
होंगी
देखना
कृष्ण
उसी
पेड़
के
नीचे
होंगे
Bekal Utsahi
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आइने
की
आँख
ही
कुछ
कम
न
थी
मेरे
लिए
जाने
अब
क्या
क्या
दिखाएगा
तुम्हारा
देखना
Parveen Shakir
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बग़ैर
चश्में
के
जो
देख
भी
न
पाता
है
वो
बेवक़ूफ़
मुझे
देखना
सिखाता
है
अगर
ये
वक़्त
डुबोएगा
मेरी
नाव
को
तो
इस
सेे
कह
दो
मुझे
तैरना
भी
आता
है
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Vikram Gaur Vairagi
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सर्द
का
मौसम
था
वो
अपने
गाँव
से
चलकर
आती
थी
उसके
बालों
पलकों
पे
गिर
के
शबनम
इठलाती
थी
बुशरा
लहजा
गाल
गुलाबी
और
बहुत
कुछ
था
लेकिन
सब
सेे
ज़्यादा
मुझको
उसकी
भूरी
आँखें
भाती
थी
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Subodh Sharma "Subh"
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उसी
का
अक्स
है
इस
कहकशाँ
में
वगरना
क्या
मैं
तकता
आसमाँ
में
करिश्मा
है
अजब
है
इश्क़
में
जो
बदन
ज़िंदा
रहे
दो
एक
जाँ
में
मुयस्सर
था
नहीं
साहिल
हमें
वो
बहा
कर
ले
गया
अपनी
रवाँ
में
अगरचे
एक
होता
तो
मैं
कहता
बहुत
से
ऐब
थे
उस
बद-गुमाँ
में
उतर
आए
बग़ावत
पर
ख़ुदा
भी
हमारी
कौन
सुनता
दो-जहाँ
में
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Subodh Sharma "Subh"
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तुम
हो
ज़ोया
इश्क़
मेरा
इस
बनारस
की
तरह
पर
मैं
कुंदन
तो
नहीं
हूँ
जो
कलाई
काट
लूँ
Subodh Sharma "Subh"
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मैं
यही
देख
रहा
था
कि
सड़क
जाती
है
फिर
वही
राह
मुसाफ़िर
में
भटक
जाती
है
इसलिए
हमने
उसे
दूर
किया
है
ख़ुद
से
जान
पहचान
मोहब्बत
के
तलक
जाती
है
मैं
नज़र
फेर
के
जाऊँ
तो
कहाँ
जाऊँगा
ज़ुल्फ़
से
हट
के
ये
झुमके
पे
अटक
जाती
है
ख़्वाब
महताब-जबीं
तख़्त-नशीं
वालों
के
हम
फ़क़ीरों
को
वही
रात
खटक
जाती
है
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Subodh Sharma "Subh"
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थाम
लो
हाथ
किधर
जाऊँगा
टूट
पाया
तो
बिखर
जाऊँगा
ये
मेरा
डर
है
कि
तेरे
दिल
से
मैं
किसी
दिन
को
उतर
जाऊँगा
इक
नज़र
फेर
मेरी
और
ज़रा
देख
मैं
कल
से
सुधर
जाऊँगा
इश्क़
में
हद
तो
नहीं
होती
पर
एक
दिन
हद
से
गुज़र
जाऊँगा
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Subodh Sharma "Subh"
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