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Subodh Sharma "Subh"
deep phir se ye jagmagaae hain
deep phir se ye jagmagaae hain | दीप फिर से ये जगमगाए हैं
- Subodh Sharma "Subh"
दीप
फिर
से
ये
जगमगाए
हैं
राम
जी
वन
से
लौट
आए
हैं
आज
कोई
नहीं
निभा
पाता
राम
ने
सब
वचन
निभाए
हैं
जाति
पे
तंज़
कसने
वालों
से
पूछना
बेर
किसने
खाए
हैं
राम
के
दिल
में
हैं
बसी
सीता
राम
को
दिल
में
हम
बसाए
हैं
पैर
अंगद
सा
शीश
को
कर
के
राम
के
दर
पे
हम
जमाए
हैं
- Subodh Sharma "Subh"
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आदमी
को
आदमी
खलता
रहेगा
उम्र-भर
ये
सिलसिला
चलता
रहेगा
रौशनी
का
काम
सब
अंधे
करेंगे
हाथ
पर
सबके
दिया
जलता
रहेगा
वो
मिलेगा
एक
दिन
इस
राह
पे
तू
यार
कब-तक
इस
तरह
चलता
रहेगा
लोग
जो
कहते
नहीं
हैं
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
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जीतने
का
शौक़
था
पर
मात
खानी
पड़
गई
इश्क़
शेर-ओ-शाइरी
में
जब
ज़बानी
पड़
गई
याद
से
हमने
तेरी
हर
इक
निशानी
दूर
की
इक
घड़ी
थी
हाथ
में
जिसकी
निशानी
पड़
गई
आज
जब
वो
लौटकर
आया
हमारी
मौत
पर
लग
रहा
कम
एक
दिन
की
ज़िंदगानी
पड़
गई
वो
मुझे
दुनिया
कहा
करता
उसे
फिर
एक
दिन
मुझको
आख़िर-कार
दुनिया
ही
दिखानी
पड़
गई
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देखता
मैं
रोज़
सर
तन
से
जुदा
होते
हुए
हाथ
में
तलवार
पकड़े
हैं
ख़ुदा
होते
हुए
Subodh Sharma "Subh"
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चल
दिया
पलट
के
मैं
घर
ख़ुमार
बाक़ी
है
कुछ
सुधार
है
मुझ
में
कुछ
सुधार
बाक़ी
है
साथ
जो
मेरे
था,
मैं
क़र्ज़-दार
सबका
हूँ
शुक्र
है
ख़ुदा
मुझपे
इक
उधार
बाक़ी
है
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किताबों
में
मेरा
दिल
है
यहीं
रखना
लिखा
हो
नाम
उसका
बस
वहीं
रखना
वहीं
रखना
जहाँ
पे
छाँव
हो
उसकी
वगरना
क़ब्र
सहरा
में
नहीं
रखना
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