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Subodh Sharma "Subh"
aadmi ko aadmi khalta rahega
aadmi ko aadmi khalta rahega | आदमी को आदमी खलता रहेगा
- Subodh Sharma "Subh"
आदमी
को
आदमी
खलता
रहेगा
उम्र-भर
ये
सिलसिला
चलता
रहेगा
रौशनी
का
काम
सब
अंधे
करेंगे
हाथ
पर
सबके
दिया
जलता
रहेगा
वो
मिलेगा
एक
दिन
इस
राह
पे
तू
यार
कब-तक
इस
तरह
चलता
रहेगा
लोग
जो
कहते
नहीं
हैं
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
- Subodh Sharma "Subh"
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तमाम
बातें
जो
चाहता
था
मैं
तुम
सेे
कहना
वो
एक
काग़ज़
पे
लिख
के
काग़ज़
जला
दिया
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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ये
वो
क़बीला
है
जो
हुस्न
को
ख़ुदा
माने
यहाँ
पे
कौन
तेरी
बात
का
बुरा
माने
इशारा
कर
दिया
है
आपकी
तरफ़
मैंने
ये
बच्चे
पूछ
रहे
थे
कि
बे-वफ़ा
माने
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Kushal Dauneria
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दिल
का
गुलाब
मैं
ने
जिसे
चूम
कर
दिया
उस
ने
मुझे
बहार
से
महरूम
कर
दिया
Anjum Barabankvi
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ख़ुदा
ने
फ़न
दिया
हमको
कि
लड़के
इश्क़
लिखेंगे
ख़ुदा
कब
जानता
था
हम,
ग़ज़ल
में
दर्द
भर
देंगे
Prashant Sharma Daraz
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इज़हार-ए-इश्क़
उस
से
न
करना
था
'शेफ़्ता'
ये
क्या
किया
कि
दोस्त
को
दुश्मन
बना
दिया
Mustafa Khan Shefta
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मैंने
आँखों
के
किनारे
भी
न
तर
होने
दिए
जिस
तरफ़
से
आया
था
सैलाब
वापस
कर
दिया
Abbas Tabish
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तिरे
बग़ैर
अजब
बज़्म-ए-दिल
का
आलम
है
चराग़
सैंकड़ों
जलते
हैं
रौशनी
कम
है
Shakeel Badayuni
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उसने
ये
कहके
मुझे
छोड़
दिया
हाशिया
छोड़
दिया
जाता
है
Subhan Asad
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ये
शुक्र
है
कि
मिरे
पास
तेरा
ग़म
तो
रहा
वगर्ना
ज़िंदगी
भर
को
रुला
दिया
होता
Gulzar
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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वो
हुस्न
था
शराब
जो
वाजिब
हुआ
नहीं
कहने
के
बावजूद
भी
मैंने
छुआ
नहीं
हासिल
नहीं
हुआ
वो
तो
हमने
भी
उम्र
ये
सज्दे
में
काट
दी
है
मगर
की
दु'आ
नहीं
लगने
लगें
जो
दाग़
परीज़ाद
तुम
पे
तो
कहना
हमारे
बीच
में
कुछ
भी
हुआ
नहीं
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Subodh Sharma "Subh"
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सर्द
का
मौसम
था
वो
अपने
गाँव
से
चलकर
आती
थी
उसके
बालों
पलकों
पे
गिर
के
शबनम
इठलाती
थी
बुशरा
लहजा
गाल
गुलाबी
और
बहुत
कुछ
था
लेकिन
सब
सेे
ज़्यादा
मुझको
उसकी
भूरी
आँखें
भाती
थी
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Subodh Sharma "Subh"
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पहले-पहल
तो
जी
का
ये
जंजाल
काट
लूँ
मुश्किल
मिरे
लिए
है
ये
फ़िलहाल
काट
लूँ
मुझको
शजर
से
तो
है
मोहब्बत
बहुत
मगर
लगने
लगी
है
सर
पे
जो
ये
डाल
काट
लूँ
अब
वक़्त
आ
गया
है
घरों
से
निकल
चलें
पिछले
बरस
कहा
था,
कि
ये
साल
काट
लूँ
कहना
उसे
कि
ठीक
से
सब
काम
चल
रहा
ख़त
पे
लिखे
हुए
मैं
ख़द-ओ-ख़ाल
काट
लूँ
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उसी
का
अक्स
है
इस
कहकशाँ
में
वगरना
क्या
मैं
तकता
आसमाँ
में
करिश्मा
है
अजब
है
इश्क़
में
जो
बदन
ज़िंदा
रहे
दो
एक
जाँ
में
मुयस्सर
था
नहीं
साहिल
हमें
वो
बहा
कर
ले
गया
अपनी
रवाँ
में
अगरचे
एक
होता
तो
मैं
कहता
बहुत
से
ऐब
थे
उस
बद-गुमाँ
में
उतर
आए
बग़ावत
पर
ख़ुदा
भी
हमारी
कौन
सुनता
दो-जहाँ
में
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Subodh Sharma "Subh"
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इक
जुर्म
तक
नहीं
था
हवाले
पड़े
रहे
ता-ज़िंदगी
ही
जान
के
लाले
पड़े
रहे
आता
है
काम
कब
ये
सिखाया
हुआ
सबक़
सब
सीख
के
भी
हाथ
पे
छाले
पड़े
रहे
क्या
इसलिए
ये
उम्र
कटी
है
ज़'ईफ़
की
गाँवों
से
दूर
उस
के
उजाले
पड़े
रहे
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