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Subodh Sharma "Subh"
ik jurm tak nahin tha hawaale pade rahe
ik jurm tak nahin tha hawaale pade rahe | इक जुर्म तक नहीं था हवाले पड़े रहे
- Subodh Sharma "Subh"
इक
जुर्म
तक
नहीं
था
हवाले
पड़े
रहे
ता-ज़िंदगी
ही
जान
के
लाले
पड़े
रहे
आता
है
काम
कब
ये
सिखाया
हुआ
सबक़
सब
सीख
के
भी
हाथ
पे
छाले
पड़े
रहे
क्या
इसलिए
ये
उम्र
कटी
है
ज़'ईफ़
की
गाँवों
से
दूर
उस
के
उजाले
पड़े
रहे
- Subodh Sharma "Subh"
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तोड़
कर
तुझको
भला
मेरा
भी
क्या
बन
जाता
उल्टा
मैं
ख़ुद
की
मुहब्बत
प
सज़ा
बन
जाता
जितनी
कोशिश
है
तिरी
एक
तवज्जोह
के
लिए
उस
सेे
कम
में
तो
मैं
दुनिया
का
ख़ुदा
बन
जाता
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Ashutosh Vdyarthi
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करे
जो
क़ैद
जुनूँ
को
वो
जाल
मत
देना
हो
जिस
में
होश
उसे
ऐसा
हाल
मत
देना
जो
मुझ
सेे
मिलने
का
तुमको
कभी
ख़याल
आए
तो
इस
ख़याल
को
तुम
कल
पे
टाल
मत
देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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मुन्सिफ़
हो
अगर
तुम
तो
कब
इंसाफ़
करोगे
मुजरिम
हैं
अगर
हम
तो
सज़ा
क्यूँँ
नहीं
देते
Ahmad Faraz
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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दिल
में
किसी
के
राह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
कितना
हसीं
गुनाह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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तेरी
आँखों
के
लिए
इतनी
सज़ा
काफ़ी
है
आज
की
रात
मुझे
ख़्वाब
में
रोता
हुआ
देख
Abhishek shukla
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तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
Fahmi Badayuni
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वो
रातों-रात
'सिरी-कृष्ण'
को
उठाए
हुए
बला
की
क़ैद
से
'बसदेव'
का
निकल
जाना
Firaq Gorakhpuri
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एक
मुद्दत
से
परिंदे
की
तरह
ये
क़ैद
है
रूह
मेरे
जिस्म
से
'क़ासिद'
रिहा
होती
नहीं
Gurbir Chhaebrra
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हसीन
लड़की
से
दिल
लगाना
भी
इक
ख़ता
है
मुझे
पता
है
अगर
सज़ा
में
मिले
क़ज़ा
तो
अलग
मज़ा
है
मुझे
पता
है
Jatin shukla
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तुम
हो
ज़ोया
इश्क़
मेरा
इस
बनारस
की
तरह
पर
मैं
कुंदन
तो
नहीं
हूँ
जो
कलाई
काट
लूँ
Subodh Sharma "Subh"
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थाम
लो
हाथ
किधर
जाऊँगा
टूट
पाया
तो
बिखर
जाऊँगा
ये
मेरा
डर
है
कि
तेरे
दिल
से
मैं
किसी
दिन
को
उतर
जाऊँगा
इक
नज़र
फेर
मेरी
और
ज़रा
देख
मैं
कल
से
सुधर
जाऊँगा
इश्क़
में
हद
तो
नहीं
होती
पर
एक
दिन
हद
से
गुज़र
जाऊँगा
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Subodh Sharma "Subh"
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पहले-पहल
तो
जी
का
ये
जंजाल
काट
लूँ
मुश्किल
मिरे
लिए
है
ये
फ़िलहाल
काट
लूँ
मुझको
शजर
से
तो
है
मोहब्बत
बहुत
मगर
लगने
लगी
है
सर
पे
जो
ये
डाल
काट
लूँ
अब
वक़्त
आ
गया
है
घरों
से
निकल
चलें
पिछले
बरस
कहा
था,
कि
ये
साल
काट
लूँ
कहना
उसे
कि
ठीक
से
सब
काम
चल
रहा
ख़त
पे
लिखे
हुए
मैं
ख़द-ओ-ख़ाल
काट
लूँ
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Subodh Sharma "Subh"
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हाथ
सर
पे
रख
रहे
गुस्ताख़
ख़ाली
जल
गया
जब
सब
बची
है
राख़
ख़ाली
इन
ठिकानों
पर
भला
अब
कौन
चहके
सब
परिंदे
उड़
गए
हैं
शाख़
ख़ाली
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Subodh Sharma "Subh"
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देखता
मैं
रोज़
सर
तन
से
जुदा
होते
हुए
हाथ
में
तलवार
पकड़े
हैं
ख़ुदा
होते
हुए
Subodh Sharma "Subh"
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