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Subodh Sharma "Subh"
ye parcham ishq ka vo dhar chuka tha
ye parcham ishq ka vo dhar chuka tha | ये परचम इश्क़ का वो धर चुका था
- Subodh Sharma "Subh"
ये
परचम
इश्क़
का
वो
धर
चुका
था
मोहब्बत
थी
हमें
वो
कर
चुका
था
मिला
था
जब
मुझे
पहले-पहल
वो
मियाँ
मैं
तो
उसी
दिन
मर
चुका
था
ग़ज़ल
के
वास्ते
फिर
से
उठाई
वगरना
मैं
क़लम
तो
धर
चुका
था
लिखा
था
ज़िंदगी
पर
उस
सेे
पहले
मोहब्बत
का
मैं
कालम
भर
चुका
था
- Subodh Sharma "Subh"
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आता
है
काम
कब
ये
सिखाया
हुआ
सबक़
सब
सीख
के
भी
हाथ
पे
छाले
पड़े
रहे
Subodh Sharma "Subh"
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जीतने
का
शौक़
था
पर
मात
खानी
पड़
गई
इश्क़
शेर-ओ-शाइरी
में
जब
ज़बानी
पड़
गई
याद
से
हमने
तेरी
हर
इक
निशानी
दूर
की
इक
घड़ी
थी
हाथ
में
जिसकी
निशानी
पड़
गई
आज
जब
वो
लौटकर
आया
हमारी
मौत
पर
लग
रहा
कम
एक
दिन
की
ज़िंदगानी
पड़
गई
वो
मुझे
दुनिया
कहा
करता
उसे
फिर
एक
दिन
मुझको
आख़िर-कार
दुनिया
ही
दिखानी
पड़
गई
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रखा
हमने
है
अपना
दिल
वहाँ
पे
वो
नक़्श-ए-पा
मिले
मुझको
जहाँ
पे
मेरी
ग़ज़लों
में
उसका
अक्स
देखो
नज़र
वो
आ
सके
शायद
यहाँ
पे
मुझे
इज़हार
पर
ये
सोचना
था
कहाँ
वो
और
'शुभ'
है
तू
कहाँ
पे
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वो
जिसे
जाना
नहीं
था
जा
चुका
है
कारवाँ
से
क्या
मुझे
चलता
रहेगा
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हर
रोज़
रोज़
दिल
में
नया
ग़म
लिए
हुए
बैठे
हुए
हैं
रौशनी
मद्धम
किए
हुए
रोते
हुए
का
हाथ
बटाना
नहीं
कभी
कहना
उसे
कि
हम
भी
ये
आलम
जिए
हुए
साबित
किया
था
हमने
मोहब्बत
को
बे-वफ़ा
कपड़े
उतार
कर
के
थे
परचम
सिए
हुए
जितनी
चढ़ी
हैं
आज
मज़ारों
पे
चादरें
उतने
गुनाह
इश्क़
में
हैं
हम
किए
हुए
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