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Subodh Sharma "Subh"
aata hai kaam kab ye sikhaaya hua sabq
aata hai kaam kab ye sikhaaya hua sabq | आता है काम कब ये सिखाया हुआ सबक़
- Subodh Sharma "Subh"
आता
है
काम
कब
ये
सिखाया
हुआ
सबक़
सब
सीख
के
भी
हाथ
पे
छाले
पड़े
रहे
- Subodh Sharma "Subh"
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पा
ए
उम्मीद
प
रक्खे
हुए
सर
हैं
हम
लोग
हैं
न
होने
के
बराबर
ही
मगर
हैं
हम
लोग
तू
ने
बरता
ही
नहीं
ठीक
से
हम
को
ऐ
दोस्त
ऐब
लगते
हैं
ब-ज़ाहिर
प
हुनर
हैं
हम
लोग
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Abhishek shukla
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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अशआ'र
मिरे
यूँँ
तो
ज़माने
के
लिए
हैं
कुछ
शे'र
फ़क़त
उन
को
सुनाने
के
लिए
हैं
ये
इल्म
का
सौदा
ये
रिसाले
ये
किताबें
इक
शख़्स
की
यादों
को
भुलाने
के
लिए
हैं
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Jaan Nisar Akhtar
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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किताब-ए-इश्क़
में
हर
आह
एक
आयत
है
पर
आँसुओं
को
हुरूफ़-ए-मुक़त्तिआ'त
समझ
Umair Najmi
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उसने
पूछा
था
पहले
हाल
मेरा
फिर
किया
देर
तक
मलाल
मेरा
मैं
वफ़ा
को
हुनर
समझता
था
मुझपे
भारी
पड़ा
कमाल
मेरा
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Subhan Asad
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ये
तो
बढ़ती
ही
चली
जाती
है
मीआद-ए-सितम
ज़ुज़
हरीफ़ान-ए-सितम
किस
को
पुकारा
जाए
वक़्त
ने
एक
ही
नुक्ता
तो
किया
है
तालीम
हाकिम-ए-वक़त
को
मसनद
से
उतारा
जाए
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Jaun Elia
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यूँँ
ही
बस
वो
मुझको
छोड़
के
सब
सेे
मिलता
रहता
है
बच्चा
भी
तो
ग़लत
किताबें
रख
लेता
है
बस्ते
में
Shahnaz Parveen Sahar
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ये
हुनर
जो
आ
जाए,
आपका
ज़माना
है
पाँव
किसके
छूने
हैं,
सर
कहाँ
झुकाना
है
Astitwa Ankur
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रदीफ़ो-क़ाफ़िया-ओ-बह'र
का
भी
इल्म
है
लाज़िम
फ़क़त
दिल
टूट
जाने
से
कोई
शाइर
नहीं
बनता
Avtar Singh Jasser
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हर
सम्त
है
ख़ुदा
वो
किसी
से
जुदा
नहीं
गालिब
नज़र
से
पी
है
नज़र
में
ख़ुदा
नहीं
Subodh Sharma "Subh"
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हर
रोज़
रोज़
दिल
में
नया
ग़म
लिए
हुए
बैठे
हुए
हैं
रौशनी
मद्धम
किए
हुए
रोते
हुए
का
हाथ
बटाना
नहीं
कभी
कहना
उसे
कि
हम
भी
ये
आलम
जिए
हुए
साबित
किया
था
हमने
मोहब्बत
को
बे-वफ़ा
कपड़े
उतार
कर
के
थे
परचम
सिए
हुए
जितनी
चढ़ी
हैं
आज
मज़ारों
पे
चादरें
उतने
गुनाह
इश्क़
में
हैं
हम
किए
हुए
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Subodh Sharma "Subh"
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हाँ
नहीं
तक़दीर
में
तो
क्या
हुआ
है
पर
हमेशा
दिल
में
तेरा
'शुभ'
रहेगा
Subodh Sharma "Subh"
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आदमी
को
आदमी
खलता
रहेगा
उम्र-भर
ये
सिलसिला
चलता
रहेगा
रौशनी
का
काम
सब
अंधे
करेंगे
हाथ
पर
सबके
दिया
जलता
रहेगा
वो
मिलेगा
एक
दिन
इस
राह
पे
तू
यार
कब-तक
इस
तरह
चलता
रहेगा
लोग
जो
कहते
नहीं
हैं
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
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Subodh Sharma "Subh"
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एक
मुद्दत
से
रही
पल
में
चली
जाएगी
ज़िंदगी
आज
या
ये
कल
में
चली
जाएगी
जो
भी
आया
है
यहाँ
उम्र
बिताने
आया
ये
धरा
भी
तो
रसातल
में
चली
जाएगी
चार
दिन
की
ही
बची
और
ख़ुशी
है
मेरी
फिर
तो
हँसने
की
रिहर्सल
में
चली
जाएगी
हम
हैं
वो
हंस
जो
बैठे
हैं
तेरी
राह
तके
तू
वो
मछली
है
जो
फिर
जल
में
चली
जाएगी
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Subodh Sharma "Subh"
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