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Subodh Sharma "Subh"
ek muddat se rahi pal men chali jaayegi
ek muddat se rahi pal men chali jaayegi | एक मुद्दत से रही पल में चली जाएगी
- Subodh Sharma "Subh"
एक
मुद्दत
से
रही
पल
में
चली
जाएगी
ज़िंदगी
आज
या
ये
कल
में
चली
जाएगी
जो
भी
आया
है
यहाँ
उम्र
बिताने
आया
ये
धरा
भी
तो
रसातल
में
चली
जाएगी
चार
दिन
की
ही
बची
और
ख़ुशी
है
मेरी
फिर
तो
हँसने
की
रिहर्सल
में
चली
जाएगी
हम
हैं
वो
हंस
जो
बैठे
हैं
तेरी
राह
तके
तू
वो
मछली
है
जो
फिर
जल
में
चली
जाएगी
- Subodh Sharma "Subh"
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हर
तरफ़
थी
बस
घुटन
मैं
ग़म-ज़दा
रोता
रहा
सोचकर
के
मैं
सभी
अपनी
ख़ता
रोता
रहा
आसमाँ
मेरा
कहाँ
साहब
यहाँ
फ़िरदौस
में
मैं
ज़मीं
का
था
ज़मीं
पर
ही
पड़ा
रोता
रहा
एक
ख़्वाहिश
दिल
में
ले
के
मैं
चला
था
शहर
को
छूटती
इक
रेल
को
मैं
देखता
रोता
रहा
वो
कहानी
याद
है
तुमको
वो
जिस
में
एक
शब
इक
शराबी
के
विरह
पे
मय-कदा
रोता
रहा
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उसके
आगे
कहें
मजाल
करें
बोल
सकते
हैं
जो
मलाल
करें
आप
शायर
हैं
कह
के
वो
मुझ
सेे
रोज़
कहता
है
इक
सवाल
करें
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हाँ
नहीं
तक़दीर
में
तो
क्या
हुआ
है
पर
हमेशा
दिल
में
तेरा
'शुभ'
रहेगा
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इक
जुर्म
तक
नहीं
था
हवाले
पड़े
रहे
ता-ज़िंदगी
ही
जान
के
लाले
पड़े
रहे
आता
है
काम
कब
ये
सिखाया
हुआ
सबक़
सब
सीख
के
भी
हाथ
पे
छाले
पड़े
रहे
क्या
इसलिए
ये
उम्र
कटी
है
ज़'ईफ़
की
गाँवों
से
दूर
उस
के
उजाले
पड़े
रहे
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तू
बता
कैसे
मैं
ख़ुद
को
इस
तरह
से
बाँट
लूँ
एक
चुनना
है
मुझे
फिर
क्यूँ
दहाई
छाँट
लूँ
वो
गले
लगकर
मुझे
रोता
है
'शुभ'
हर
बार
तो
पहले
ग़ुस्सा
कर
चुका
हूँ
अब
ज़रा
सा
डाँट
लूँ
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