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Subodh Sharma "Subh"
rakha hamne hai apna dil vahaañ pe
rakha hamne hai apna dil vahaañ pe | रखा हमने है अपना दिल वहाँ पे
- Subodh Sharma "Subh"
रखा
हमने
है
अपना
दिल
वहाँ
पे
वो
नक़्श-ए-पा
मिले
मुझको
जहाँ
पे
मेरी
ग़ज़लों
में
उसका
अक्स
देखो
नज़र
वो
आ
सके
शायद
यहाँ
पे
मुझे
इज़हार
पर
ये
सोचना
था
कहाँ
वो
और
'शुभ'
है
तू
कहाँ
पे
- Subodh Sharma "Subh"
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जब
किया
इज़हार
तो
हंँस
कर
मुझे
कहने
लगी
प्यार
से
दो
बात
करना
प्यार
हो
जाता
है
क्या
Dipendra Singh 'Raaz'
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है
समझना
आपको
तो
शे'र
से
इज़हार
समझें
बात
कहने
को
भला
हम
फूल
क्यूँ
तोड़ा
करेंगे
Ankit Maurya
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किस
से
इज़हार-ए-मुद्दआ
कीजे
आप
मिलते
नहीं
हैं
क्या
कीजे
Jaun Elia
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दिल
पे
कुछ
और
गुज़रती
है
मगर
क्या
कीजे
लफ़्ज़
कुछ
और
ही
इज़हार
किए
जाते
हैं
Jaleel 'Aali'
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मैं
ने
पूछा
था
कि
इज़हार
नहीं
हो
सकता
दिल
पुकारा
कि
ख़बर-दार
नहीं
हो
सकता
Abbas Tabish
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हाए!
इज़हार
करके
पछताए
उसको
इक
दोस्त
की
ज़रूरत
थी
Kumar Vikas
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आज
फिर
इज़हार
करते
हैं
सनम
आपसे
ही
प्यार
करते
हैं
सनम
आपको
क्या
इश्क़
से
परहेज़
है
आप
क्यूँ
इनकार
करते
हैं
सनम
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Divy Kamaldhwaj
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अगर
है
इश्क़
सच्चा
तो
निगाहों
से
बयाँ
होगा
ज़बाँ
से
बोलना
भी
क्या
कोई
इज़हार
होता
है
Bhaskar Shukla
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मसअला
ये
नहीं
कि
इश्क़
हुआ
है
हम
को
मसअला
ये
है
कि
इज़हार
किया
जाना
है
Rajesh Reddy
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चलो
करके
देखेंगे
इज़हार
अब
की
मुहब्बत
न
होगी
अदावत
तो
होगी
Tiwari Jitendra
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रात
हम
सेे
न
बसर
की
जाए
आँख
ये
मुझ'से
उधर
की
जाए
देख
लो
हाल
मेरा
सोचो
फिर
अब
कहीं
और
नज़र
की
जाए
चुप
है,
कुछ
बोल,बता
जो
भी
हो
बात
उसकी
न
मगर
की
जाए
एक
बोतल
कि
बची
है
कल
से
अब
चलो
शाम
बसर
की
जाए
था
मैं
बद-नाम
मगर
पहले
था
अब
तो
उँगली
न
इधर
की
जाए
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Subodh Sharma "Subh"
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लोग
जो
कहते
नहीं
है
दुख
किसी
से
शा'इरी
में
वो
सदा
ढलता
रहेगा
Subodh Sharma "Subh"
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ये
परचम
इश्क़
का
वो
धर
चुका
था
मोहब्बत
थी
हमें
वो
कर
चुका
था
मिला
था
जब
मुझे
पहले-पहल
वो
मियाँ
मैं
तो
उसी
दिन
मर
चुका
था
ग़ज़ल
के
वास्ते
फिर
से
उठाई
वगरना
मैं
क़लम
तो
धर
चुका
था
लिखा
था
ज़िंदगी
पर
उस
सेे
पहले
मोहब्बत
का
मैं
कालम
भर
चुका
था
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Subodh Sharma "Subh"
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तू
बता
कैसे
मैं
ख़ुद
को
इस
तरह
से
बाँट
लूँ
एक
चुनना
है
मुझे
फिर
क्यूँ
दहाई
छाँट
लूँ
वो
गले
लगकर
मुझे
रोता
है
'शुभ'
हर
बार
तो
पहले
ग़ुस्सा
कर
चुका
हूँ
अब
ज़रा
सा
डाँट
लूँ
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Subodh Sharma "Subh"
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उसी
का
अक्स
है
इस
कहकशाँ
में
वगरना
क्या
मैं
तकता
आसमाँ
में
करिश्मा
है
अजब
है
इश्क़
में
जो
बदन
ज़िंदा
रहे
दो
एक
जाँ
में
मुयस्सर
था
नहीं
साहिल
हमें
वो
बहा
कर
ले
गया
अपनी
रवाँ
में
अगरचे
एक
होता
तो
मैं
कहता
बहुत
से
ऐब
थे
उस
बद-गुमाँ
में
उतर
आए
बग़ावत
पर
ख़ुदा
भी
हमारी
कौन
सुनता
दो-जहाँ
में
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Subodh Sharma "Subh"
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