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Subodh Sharma "Subh"
kisi din mood ghooma to ye chakka jaam kar denge
kisi din mood ghooma to ye chakka jaam kar denge | किसी दिन मूड घूमा तो ये चक्का जाम कर देंगे
- Subodh Sharma "Subh"
किसी
दिन
मूड
घूमा
तो
ये
चक्का
जाम
कर
देंगे
मेरा
चर्चा
तेरे
अख़बार
में,
पैग़ाम
कर
देंगे
हमारे
ख़ून
में
मेहनत
की
ये
मिक़दार
इतनी
है
ये
दस्तावेज़
डिग्री
सब
ही
तेरे
नाम
कर
देंगे
तुझे
चुन
के
बता
फिर
से
भला
अब
क्या
करेंगे
हम
हमारे
काम
तो
पूरे
सभी,
श्री
राम
कर
देंगे
- Subodh Sharma "Subh"
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मैं
ने
मेहनत
से
हथेली
पे
लकीरें
खींचीं
वो
जिन्हें
कातिब-ए-तक़दीर
नहीं
खींच
सका
Umair Najmi
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चाहे
तो
कोशिश
कर
लो
दावा
है
भूल
न
पाओगी
जब
भी
ज़िक्र-ए-वफ़ा
होगा
तुम
मेरे
शे'र
सुनाओगी
Harsh saxena
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मज़दूर
भले
सारी
ही
उम्र
करे
मेहनत
बेटी
की
विदाई
लायक़
पैसे
नहीं
होते
Amaan Pathan
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एक
मुसलसल
कोशिश
यह
बतलाती
है
छैनी
से
पर्वत
काटा
जा
सकता
है
Divy Kamaldhwaj
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मेहनत
तो
करता
हूँ
फिर
भी
घर
ख़ाली
है
बाबूजी
मिट्टी
के
कुछ
दीपक
ले
लो
दीवाली
है
बाबूजी
मिट्टी
बेच
रहा
हूँ
जिस
में
कोई
जाल
फ़रेब
नहीं
सोना
चाँदी
दूध
मिठाई
सब
जा'ली
है
बाबूजी
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Gyan Prakash Akul
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शायद
अगली
इक
कोशिश
तक़दीर
बदल
दे
ज़हर
तो
जब
जी
चाहे
खाया
जा
सकता
है
Siraj Faisal Khan
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इस
दुनिया
का
हर
मंसूबा
हर
कोशिश
बेकार
हुई
इक
बच्चे
ने
हाथ
बढ़ाया
चाँद
को
छूकर
देख
लिया
Tariq Qamar
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दुनिया
वालों
ने
तो
पूरी
कोशिश
की
ठुकराने
की
लेकिन
अपनी
जिद्द
में
हमने
ख़ुद
को
मनवा
रक्खा
है
Manish Shukla
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मुझ
को
ख़्वाहिश
है
उसी
शान
की
दिवाली
की
लक्ष्मी
देश
में
उल्फ़त
की
शब-ओ-रोज़
रहे
देश
को
प्यार
से
मेहनत
से
सँवारें
मिल
कर
अहल-ए-भारत
के
दिलों
में
ये
'कँवल'
सोज़
रहे
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Kanval Dibaivi
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मुहब्बत
दुसरी
कोशिश
में
पहली
मर्तबा
होगी
वही
स्कूल
की
लड़की
मेरे
कॉलेज
में
आई
है
Nasir khan 'Nasir'
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इक
जुर्म
तक
नहीं
था
हवाले
पड़े
रहे
ता-ज़िंदगी
ही
जान
के
लाले
पड़े
रहे
आता
है
काम
कब
ये
सिखाया
हुआ
सबक़
सब
सीख
के
भी
हाथ
पे
छाले
पड़े
रहे
क्या
इसलिए
ये
उम्र
कटी
है
ज़'ईफ़
की
गाँवों
से
दूर
उस
के
उजाले
पड़े
रहे
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Subodh Sharma "Subh"
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हाँ
नहीं
तक़दीर
में
तो
क्या
हुआ
है
पर
हमेशा
दिल
में
तेरा
'शुभ'
रहेगा
Subodh Sharma "Subh"
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इक
नज़र
देख'ने
की
ज़िद
पे
अड़े
होते
हैं
उँगलियाँ
छोड़
के
शानों
पे
खड़े
होते
हैं
देख
कर
रोज़
यही
सोच'ता
हूँ
जूतों
को
बाप
के
पाँव
क्यूँँ
इत'ने
बड़े
होते
हैं
कौन
हासिल
है
मुझे
कौन
मेरा
अपना
है
फ़ैसले
सब
ये
नसीबों
पे
पड़े
होते
हैं
उम्र
तो
बीत
ही
जानी
है
इसे
भरने
में
बख़्त
की
मार
के
भी
घाव
बड़े
होते
हैं
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Subodh Sharma "Subh"
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तू
बता
कैसे
मैं
ख़ुद
को
इस
तरह
से
बाँट
लूँ
एक
चुनना
है
मुझे
फिर
क्यूँ
दहाई
छाँट
लूँ
वो
गले
लगकर
मुझे
रोता
है
'शुभ'
हर
बार
तो
पहले
ग़ुस्सा
कर
चुका
हूँ
अब
ज़रा
सा
डाँट
लूँ
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Subodh Sharma "Subh"
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मक़ाम-ए-दिल
में
दर्जा
दो
दफ़ा
हासिल
नहीं
होता
मेरी
उँगली
कमल
पर
है
मगर
ये
दिल
नहीं
होता
पढ़ाई
छोड़
कर
मैं
लौट
आया
गाँव
को
अपने
फ़क़त
डिग्री
से
अब
कुछ
भी
कहीं
हासिल
नहीं
होता
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Subodh Sharma "Subh"
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