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Siraj Faisal Khan
shaayad agli ik koshish taqdeer badal de
shaayad agli ik koshish taqdeer badal de | शायद अगली इक कोशिश तक़दीर बदल दे
- Siraj Faisal Khan
शायद
अगली
इक
कोशिश
तक़दीर
बदल
दे
ज़हर
तो
जब
जी
चाहे
खाया
जा
सकता
है
- Siraj Faisal Khan
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जिन
की
दर्द-भरी
बातों
से
एक
ज़माना
राम
हुआ
'क़ासिर'
ऐसे
फ़न-कारों
की
क़िस्मत
में
बन-बास
रहा
Ghulam Mohammad Qasir
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किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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इस
बेवफ़ाई
पर
मुझे
हैरत
नहीं
तुझको
पा
लूँ
ऐसी
मिरी
क़िस्मत
नहीं
Harsh saxena
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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पलटा
दे
तक़दीर
हमारी
आकर
माथा
चूम
हमारा
Siddharth Saaz
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वहम
होता
है
कि
छूने
से
सँवर
जाएँगी
सोचता
हूँ
जो
मुक़द्दर
मिरा
ज़ुल्फ़ें
तेरी
Neeraj Neer
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जुदा
किसी
से
किसी
का
ग़रज़
हबीब
न
हो
ये
दाग़
वो
है
कि
दुश्मन
को
भी
नसीब
न
हो
Nazeer Akbarabadi
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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परिंद
पेड़
से
परवाज़
करते
जाते
हैं
कि
बस्तियों
का
मुक़द्दर
बदलता
जाता
है
Asad Badayuni
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ज़मीं
पर
बस
लहू
बिखरा
हमारा
अभी
बिखरा
नहीं
जज़्बा
हमारा
हमें
रंजिश
नहीं
दरिया
से
कोई
सलामत
गर
रहे
सहरा
हमारा
मिला
कर
हाथ
सूरज
की
किरन
से
मुख़ालिफ़
हो
गया
साया
हमारा
रक़ीब
अब
वो
हमारे
हैं
जिन्होंने
नमक
ता-ज़िंदगी
खाया
हमारा
है
जब
तक
साथ
बंजारा-मिज़ाजी
कहाँ
मंज़िल
कहाँ
रस्ता
हमारा
त'अल्लुक़
तर्क
कर
के
हो
गया
है
ये
रिश्ता
और
भी
गहरा
हमारा
बहुत
कोशिश
की
लेकिन
जुड़
न
पाया
तुम्हारे
नाम
में
आधा
हमारा
इधर
सब
हम
को
क़ातिल
कह
रहे
हैं
उधर
ख़तरे
में
था
कुनबा
हमारा
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Siraj Faisal Khan
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ख़याल
कब
से
छुपा
के
ये
मन
में
रक्खा
है
मिरा
क़रार
तुम्हारे
बदन
में
रक्खा
है
Siraj Faisal Khan
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मैं
तेरे
ज़िक्र
की
वादी
में
सैर
करता
रहूँ
हमेशा
लब
पे
तेरे
नाम
की
मिठास
रहे
Siraj Faisal Khan
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हौसले
थे
कभी
बुलंदी
पर
अब
फ़क़त
बेबसी
बुलंदी
पर
ख़ाक
में
मिल
गई
अना
सब
की
चढ़
गई
थी
बड़ी
बुलंदी
पर
फिर
ज़मीं
पर
बिखर
गई
आ
कर
धूप
कुछ
पल
रही
बुलंदी
पर
खिल
रही
है
तमाम
ख़ुशियों
में
इक
तुम्हारी
कमी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
से
यही
समझते
थे
है
बहुत
रौशनी
बुलंदी
पर
गिर
गई
हैं
समाज
की
क़द्रें
चढ़
गया
आदमी
बुलंदी
पर
ज़िंदगी
देख
कर
हुई
हैरान
आ
गई
मौत
भी
बुलंदी
पर
मुझ
से
सहरा
पनाह
माँगे
है
देख
वहशत
मेरी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
पर
गिरे
बुलंदी
से
ख़ाक
उड़
कर
गई
बुलंदी
पर
एक
दिल
पर
कभी
हुकूमत
थी
या'नी
मैं
था
कभी
बुलंदी
पर
खल
रही
है
कुछ
एक
लोगों
को
मेरी
मौजूदगी
बुलंदी
पर
है
ख़ुदा
सामने
मेरे
मौजूद
आ
गई
बंदगी
बुलंदी
पर
खिल
रही
है
तमाम
ख़ुशियों
में
इक
तुम्हारी
कमी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
से
यही
समझते
थे
है
बहुत
रौशनी
बुलंदी
पर
गिर
गई
हैं
समाज
की
क़द्रें
चढ़
गया
आदमी
बुलंदी
पर
ज़िंदगी
देख
कर
हुई
हैरान
आ
गई
मौत
भी
बुलंदी
पर
मुझ
से
सहरा
पनाह
माँगे
है
देख
वहशत
मेरी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
पर
गिरे
बुलंदी
से
ख़ाक
उड़
कर
गई
बुलंदी
पर
एक
दिल
पर
कभी
हुकूमत
थी
या'नी
मैं
था
कभी
बुलंदी
पर
खल
रही
है
कुछ
एक
लोगों
को
मेरी
मौजूदगी
बुलंदी
पर
है
ख़ुदा
सामने
मेरे
मौजूद
आ
गई
बंदगी
बुलंदी
पर
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Siraj Faisal Khan
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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