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Satyam Shukla
gar saza men umr bhar ki ba-mashqqat qaid hai
gar saza men umr bhar ki ba-mashqqat qaid hai | गर सज़ा में उम्र भर की बा-मशक़्क़त क़ैद है
- Satyam Shukla
गर
सज़ा
में
उम्र
भर
की
बा-मशक़्क़त
क़ैद
है
जुर्म
भी
फिर
इश्क़
सा
संगीन
होना
चाहिए
- Satyam Shukla
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दिल
में
किसी
के
राह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
कितना
हसीं
गुनाह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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तोड़
कर
तुझको
भला
मेरा
भी
क्या
बन
जाता
उल्टा
मैं
ख़ुद
की
मुहब्बत
प
सज़ा
बन
जाता
जितनी
कोशिश
है
तिरी
एक
तवज्जोह
के
लिए
उस
सेे
कम
में
तो
मैं
दुनिया
का
ख़ुदा
बन
जाता
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Ashutosh Vdyarthi
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किसी
के
साए
को
क़ैद
करने
का
एक
तरीक़ा
बता
रहा
हूँ
एक
उसके
आगे
चराग़
रख
दे,
एक
उसके
पीछे
चराग़
रख
दे
मैं
दिल
की
बातों
में
आ
गया
और
उठा
के
ले
आया
उसकी
पायल
दिमाग़
देता
रहा
सदाएँ,
चराग़
रख
दे,
चराग़
रख
दे
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Charagh Sharma
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आधी
आधी
रात
तक
सड़कों
के
चक्कर
काटिए
शा'इरी
भी
इक
सज़ा
है
ज़िंदगी
भर
काटिए
कोई
तो
हो
जिस
से
उस
ज़ालिम
की
बातें
कीजिए
चौदहवीं
का
चाँद
हो
तो
रात
छत
पर
काटिए
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Nisar Nasik
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सज़ा
सच
बोलने
की
यह
मिली
है
सभी
ने
कर
लिया
हम
से
किनारा
Meem Alif Shaz
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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मेरी
बाँहों
में
बहकने
की
सज़ा
भी
सुन
ले
अब
बहुत
देर
में
आज़ाद
करूँँगा
तुझ
को
Jaun Elia
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करे
जो
क़ैद
जुनूँ
को
वो
जाल
मत
देना
हो
जिस
में
होश
उसे
ऐसा
हाल
मत
देना
जो
मुझ
सेे
मिलने
का
तुमको
कभी
ख़याल
आए
तो
इस
ख़याल
को
तुम
कल
पे
टाल
मत
देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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मिरी
सुब्ह
का
यूँँ
भी
इज़हार
हो
पियाला
हो
कॉफ़ी
का
अख़बार
हो
कोई
जुर्म
साबित
न
हो
उसका
फिर
जो
तेरी
हँसी
में
गिरफ़्तार
हो
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Swapnil Tiwari
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मुझे
औरों
का
ग़म
भी
बाँटना
है
ख़ुदा
मेरे
दुखों
को
ख़त्म
कर
दे
Satyam Shukla
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इक
वफ़ादार
'आशिक़
भी
क्या
चाहता
है
अपनी
हर
माशुका
से
वफ़ा
चाहता
है,
दिल-लगी
के
बिना
शा'इरी
का
हुनर
हो
बिन
सफ़र
में
गए
हादसा
चाहता
है
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Satyam Shukla
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नई
मंज़िल
को
पाना
चाहते
हैं,
क़दम
फिर
लड़खड़ाना
चाहते
हैं
Satyam Shukla
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कल
यह
रिश्ता
बदनाम
न
हो
बेहतर
है
इसका
नाम
न
हो
यह
सोच
के
उसका
काम
किया
कल
मुझको
उस
सेे
काम
न
हो
क्या
आज
से
पीना
छोड़
दिया
इस
बात
पे
फिर
क्यूँ
जाम
न
हो
उन
लबों
का
हश्र
ख़ुदा
जाने
जिन
लबों
पे
जय
श्री
राम
न
हो
इस
वक़्त
को
जी
भर
जी
लो
तुम
शायद
फिर
ऐसी
शाम
न
हो
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Satyam Shukla
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मुहब्बत
मर
तो
जाती
है
फ़क़त
इक
पल
में
ही
लेकिन,
बहुत
तकलीफ़
देती
है
हमें
ये
दफ़्न
होने
तक
Satyam Shukla
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