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Moid Rahbar
ye usse rabt-o-zabt badhaane ka hai sila
ye usse rabt-o-zabt badhaane ka hai sila | ये उस सेे रब्त-ओ-ज़ब्त बढ़ाने का है सिला
- Moid Rahbar
ये
उस
सेे
रब्त-ओ-ज़ब्त
बढ़ाने
का
है
सिला
उसकी
ख़ता
को
मेरी
ख़ता
मानते
हैं
लोग
- Moid Rahbar
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बस-कि
दुश्वार
है
हर
काम
का
आसाँ
होना
आदमी
को
भी
मुयस्सर
नहीं
इंसाँ
होना
Mirza Ghalib
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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मोहब्बत
एक
ख़ुशबू
है
हमेशा
साथ
चलती
है
कोई
इंसान
तन्हाई
में
भी
तन्हा
नहीं
रहता
Bashir Badr
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अलमास
धरे
रह
जाते
हैं
बिकता
है
तो
पत्थर
बिकता
है
अजनास
नहीं
इस
दुनिया
में
इंसाँ
का
मुक़द्दर
बिकता
है
'खालिद
सज्जाद'
सुनार
हूँ
मैं
इस
ग़म
को
ख़ूब
समझता
हूँ
जब
बेटा
छुप
कर
रोता
है
तब
माँ
का
ज़ेवर
बिकता
है
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Khalid Sajjad
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तलब
करें
तो
ये
आँखें
भी
इन
को
दे
दूँ
मैं
मगर
ये
लोग
इन
आँखों
के
ख़्वाब
माँगते
हैं
Abbas rizvi
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कान्हा
होंगे
लोग
वहाँ
के
राधा
होंगी
बालाएँ
प्यार
की
बंसी
बजती
होगी
हर
समय
हर
ठाओं
रे
Ghaus Siwani
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ज़िक्र
तबस्सुम
का
आते
ही
लगते
हैं
इतराने
लोग
और
ज़रा
सी
ठेस
लगी
तो
जा
पहुँचे
मयख़ाने
लोग
Ateeq Allahabadi
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तदबीर
के
दस्त-ए-रंगीं
से
तक़दीर
दरख़्शाँ
होती
है
क़ुदरत
भी
मदद
फ़रमाती
है
जब
कोशिश-ए-इंसाँ
होती
है
Hafeez Banarasi
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कुछ
लोग
ख़यालों
से
चले
जाएँ
तो
सोएँ
बीते
हुए
दिन
रात
न
याद
आएँ
तो
सोएँ
Habib Jalib
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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अंजाम
ए
हिज्र
क्या
है
ये
तुम
ख़ुद
ही
देख
लो
हम
इन्तिज़ार
यार
में
पत्थर
के
हो
गए
Moid Rahbar
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ग़ज़ल
के
हुस्न
का
जब
हम
सिंगार
करते
हैं
हर
एक
लफ़्ज़
को
आईनादार
करते
हैं
बना
बना
के
मिटाते
हैं
सैकड़ों
खा़के
तब
एक
शे'र
को
बेहतर
शुमार
करते
हैं
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Moid Rahbar
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रब्त
इक़बाल
से
मेरा
है
न
है
मीर
के
साथ
हाज़िर-ए-बज़्म
हूँ
मैं
अपनी
ही
तहरीर
के
साथ
Moid Rahbar
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अज़
राहे
सुख़न
जब
भी
क़लम
मेरा
उठा
है
अफ़्कार
की
दुनिया
का
नया
बाब
खुला
है
सच्चाई
तो
ये
है
कि
अभी
मुझ
सेा
क़लमकार
लफ़्ज़ों
को
बरतने
का
हुनर
सीख
रहा
है
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Moid Rahbar
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इश्क़
ऐसा
है
पाकीज़गी
के
बग़ैर
शा'इरी
जैसे
हर्फ़-ए-रवी
के
बग़ैर
Moid Rahbar
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