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Moid Rahbar
ghazal ke husn ka jab ham singaar karte hain
ghazal ke husn ka jab ham singaar karte hain | ग़ज़ल के हुस्न का जब हम सिंगार करते हैं
- Moid Rahbar
ग़ज़ल
के
हुस्न
का
जब
हम
सिंगार
करते
हैं
हर
एक
लफ़्ज़
को
आईनादार
करते
हैं
बना
बना
के
मिटाते
हैं
सैकड़ों
खा़के
तब
एक
शे'र
को
बेहतर
शुमार
करते
हैं
- Moid Rahbar
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कुछ
इस
सलीक़े
से
माथे
पे
उसने
होंट
रखे
बदन
को
छोड़
के
सारी
थकन
को
चूम
लिया
Harsh saxena
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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सच
तो
ये
है
'मजाज़'
की
दुनिया
हुस्न
और
इश्क़
के
सिवा
क्या
है
Asrar Ul Haq Majaz
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काम
आया
तिरंगा
कफ़न
के
लिए
कोई
क़ुर्बां
हुआ
था
वतन
के
लिए
सोचो
क्या
कर
लिया
तुमने
जी
कर
के
दोस्त
नस
भी
काटी
तो
बस
इक
बदन
के
लिए
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Neeraj Neer
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वक़्त-ए-रुख़्सत
आब-दीदा
आप
क्यूँँ
हैं
जिस्म
से
तो
जाँ
हमारी
जा
रही
है
Azm Shakri
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बदन
का
ज़िक्र
बातिल
है
तो
आओ
बिना
सर
पैर
की
बातें
करेंगे
Fahmi Badayuni
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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इसी
कारण
से
मैं
उसका
बदन
छूता
नहीं
यारों
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
में
वो
लिक्खा
नहीं
यारों
Harsh saxena
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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जिस्म
के
पार
जाना
पड़ा
था
कभी
इश्क़
कर
के
हुई
बंदगी
की
समझ
Neeraj Neer
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अंजाम
ए
हिज्र
क्या
है
ये
तुम
ख़ुद
ही
देख
लो
हम
इन्तिज़ार
यार
में
पत्थर
के
हो
गए
Moid Rahbar
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ये
उस
सेे
रब्त-ओ-ज़ब्त
बढ़ाने
का
है
सिला
उसकी
ख़ता
को
मेरी
ख़ता
मानते
हैं
लोग
Moid Rahbar
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इक
मिसाली
शे'र
भी
मैं
कह
न
पाया
आज
तक
इसलिए
जाना
है
मुझको
फ़िक्र
की
मेराज
तक
Moid Rahbar
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अज़
राहे
सुख़न
जब
भी
क़लम
मेरा
उठा
है
अफ़्कार
की
दुनिया
का
नया
बाब
खुला
है
सच्चाई
तो
ये
है
कि
अभी
मुझ
सेा
क़लमकार
लफ़्ज़ों
को
बरतने
का
हुनर
सीख
रहा
है
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Moid Rahbar
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रब्त
इक़बाल
से
मेरा
है
न
है
मीर
के
साथ
हाज़िर-ए-बज़्म
हूँ
मैं
अपनी
ही
तहरीर
के
साथ
Moid Rahbar
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