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Mohit Subran
goonjti hain kaanon men jo
goonjti hain kaanon men jo | गूँजती हैं कानों में जो
- Mohit Subran
गूँजती
हैं
कानों
में
जो
ये
सदाएँ
हैं
कि
तुम
हो
आ
लिपट
जाती
हैं
मुझ
सेे
ये
हवाएँ
हैं
कि
तुम
हो
- Mohit Subran
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ख़ुद
को
उस
वक़्त
निखारा
होता
तो
बुलंदी
पे
सितारा
होता
रोकता
कौन
हमें
दुनिया
में
फिर
गर
उधर
से
भी
इशारा
होता
धूल
से
भर
गई
गुल्लक
वर्ना
मैं
तुझे
सब
से
पियारा
होता
जिस्म
जज़्बात
जिगर
को
मैंने
और
किसी
तन
में
उतारा
होता
यूँँ
न
उलझाता
लटें
ज़िन्दगी
की
ज़ुल्फ़
को
इस
की
सँवारा
होता
बहता
हूँ
दर्द
के
जिस
दरिया
में
कोई
तो
इसका
किनारा
होता
रास
बर्बादी
ही
आई
वर्ना
मैं
हर
इक
आँख
का
तारा
होता
लम्हा
जो
गुज़रा
दो
लम्हे
पहले
लम्हा
वो
हँस
के
गुज़ारा
होता
क्यूँ
दी
आवाज़
तुझे
डूबते
वक़्त
काश
तुझ
को
न
पुकारा
होता
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Mohit Subran
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बची
ज़ीस्त
में
न
हो
इक़्तिज़ा
कभी
एक-दूसरे
की
हमें
तिरी
भी
गुज़र
हो
मिरे
बिना,
मिरी
भी
बसर
हो
तिरे
बिना
Mohit Subran
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किसी
दिन
तो
हमें
था
टूटना
देखो
गए
हम
टूट
बिखरना
रह
गया
है
अब
बिखर
भी
जाएँगे
इक
दिन
Mohit Subran
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और
कब
तक
ढोएँगे
ये
ज़िन्दगी
का
बोझ
हम
और
कब
तक
मौत
काँधों
को
सताएगी
भला
Mohit Subran
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ये
जो
दबा
दी
तुम
ने
ख़बर
आज
टीवी
पे
तुम
क्या
समझते
हो
मुझे
इसकी
ख़बर
नहीं
Mohit Subran
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