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Maviya abdul kalam khan
rahkar ke bheed men bhi jo tanhaa hua hooñ main
rahkar ke bheed men bhi jo tanhaa hua hooñ main | रहकर के भीड़ में भी जो तन्हा हुआ हूँ मैं
- Maviya abdul kalam khan
रहकर
के
भीड़
में
भी
जो
तन्हा
हुआ
हूँ
मैं
कैसे
बताऊँ
यार
के
टूटा
हुआ
हूँ
मैं
मुझको
कहाँ
कहाँ
से
समेटोगे
तुम
भला
अपनों
के
दरमियान
जो
बिखरा
हुआ
हूँ
मैं
- Maviya abdul kalam khan
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रात
दिन
तेरे
साथ
कटते
थे
यार
अब
तुझ
सेे
बात
से
भी
गए
ये
मोहब्बत
भी
किन
दिनों
में
हुई
दिल
मिलाने
थे
हाथ
से
भी
गए
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Kafeel Rana
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क्या
कहा
दोस्त
समझना
है
तुम्हें
प्यार
नहीं
यानी
बस
देखना
है
पानी
को
पीना
नहीं
है
Neeraj Neer
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टूटते
रिश्तों
से
बढ़कर
रंज
था
इस
बात
का
दरमियाँ
कुछ
दोस्त
थे,
और
दोस्त
भी
ऐसे,
के
बस
Renu Nayyar
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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एक
ही
नदी
के
हैं
ये
दो
किनारे
दोस्तो
दोस्ताना
ज़िंदगी
से
मौत
से
यारी
रखो
Rahat Indori
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ग़रज़
कि
काट
दिए
ज़िंदगी
के
दिन
ऐ
दोस्त
वो
तेरी
याद
में
हों
या
तुझे
भुलाने
में
Firaq Gorakhpuri
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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यार
तस्वीर
में
तन्हा
हूँ
मगर
लोग
मिले
कई
तस्वीर
से
पहले
कई
तस्वीर
के
बा'द
Umair Najmi
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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चराग़-ए-रौशनी
हो
कर
दर-ए-दिल
तक
न
पहुँचा
हूँ
नज़र
में
हुस्न
की
यारो
अभी
तक
भी
बुझा
सा
हूँ
ख़बर
करना
ज़रा
क़ासिद
हसीं
साँसों
की
धड़कन
को
हवा
दामन
से
गर
दे
वो
महकता
मैं
उजाला
हूँ
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Maviya abdul kalam khan
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ग़ज़लें
तो
पढ़
रहे
थे
वो
'अहमद
फ़राज़'
की
महफ़िल
में
लोग
मुझको
बड़े
चोर
लगे
हैं
Maviya abdul kalam khan
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दु'आ
को
ख़ुदाया
मेरी
बा-असर
कर
मुझे
साजिशों
से
सदा
बा-ख़बर
कर
Maviya abdul kalam khan
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जिस
पे
लफ़्ज़ों
का
वार
होता
है
उसका
दिल
बेकरार
होता
है
माँ
का
साया
जहाँ
नहीं
होता
घर
वो
उजड़ा
दयार
होता
है
छीन
कर
हक
किसी
का
यूँँ
जीना
दिल
पे
अपने
तो
बार
होता
है
चोट
लगती
है
जब
भी
अपनों
से
ग़ैरों
पर
ऐतबार
होता
है
हम
जियें
कैसे
यूँँ
उसूलों
पर
हम
से
हरगिज़
न
यार
होता
है
कोई
हम
को
कलाम
बतलाऐ
जाने
कैसे
ये
प्यार
होता
है
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Maviya abdul kalam khan
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रुकने
का
मुझे
कोई
बहाना
नहीं
मिलता
ठहरूं
मैं
कहाँ
मुझको
ठिकाना
नहीं
मिलता
पिन्हाँ
है
कई
दर्द
कहानी
में
मेरे
जो
मुझ
जैसा
किसी
का
भी
फसाना
नहीं
मिलता
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Maviya abdul kalam khan
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