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Maviya abdul kalam khan
charaagh-e-raushni ho kar dar-e-dil tak na pahuncha hooñ
charaagh-e-raushni ho kar dar-e-dil tak na pahuncha hooñ | चराग़-ए-रौशनी हो कर दर-ए-दिल तक न पहुँचा हूँ
- Maviya abdul kalam khan
चराग़-ए-रौशनी
हो
कर
दर-ए-दिल
तक
न
पहुँचा
हूँ
नज़र
में
हुस्न
की
यारो
अभी
तक
भी
बुझा
सा
हूँ
ख़बर
करना
ज़रा
क़ासिद
हसीं
साँसों
की
धड़कन
को
हवा
दामन
से
गर
दे
वो
महकता
मैं
उजाला
हूँ
- Maviya abdul kalam khan
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चराग़
दिल
का
मुक़ाबिल
हवा
के
रखते
हैं
हर
एक
हाल
में
तेवर
बला
के
रखते
हैं
Hastimal Hasti
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मेरे
साथ
हँसने
वालों
शरीक
हों
दुख
में
गर
गुलाब
की
ख़्वाहिश
है
तो
चूम
काँटों
को
Neeraj Neer
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लो
हमारा
जवाब
ले
जाओ
ये
महकता
गुलाब
ले
जाओ
Aleena Itrat
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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चराग़ों
को
उछाला
जा
रहा
है
हवा
पर
रौब
डाला
जा
रहा
है
Rahat Indori
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न
हारा
है
इश्क़
और
न
दुनिया
थकी
है
दिया
जल
रहा
है
हवा
चल
रही
है
Khumar Barabankvi
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ख़ुशबू
से
किस
ज़बान
में
बातें
करेंगे
लोग
महफ़िल
में
ये
सवाल
तुझे
देख
कर
हुआ
Mansoor Usmani
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फिर
नज़र
में
फूल
महके
दिल
में
फिर
शमएँ
जलीं
फिर
तसव्वुर
ने
लिया
उस
बज़्म
में
जाने
का
नाम
Faiz Ahmad Faiz
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सूख
जाता
जल्द
है
फिर
भी
निशानी
के
लिए
फूल
इक
छुप
के
किताबों
में
छिपाना
इश्क़
है
Parul Singh "Noor"
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रंजिशों
से
जुदा
रास्ते
हो
गए
और
फिर
दरमियाँ
फ़ासले
हो
गए
हम
जहाँ
से
चले
आ
गए
फिर
वहीं
रक्स-ए
हालात
से
दाएरे
हो
गए
शीरीं
पैराए
में
जब
भी
की
गुफ्तगू
हम
तो
गिरवीदा
बस
आपके
हो
गए
गांव
जलता
रहा
वो
तमाशाई
थे
उनके
शहरों
में
भी
हादसे
हो
गए
अपने
हो
कर
भी
थे
जो
कभी
अजनबी
हाजतों
के
सबब
वास्ते
हो
गए
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जिस
पे
लफ़्ज़ों
का
वार
होता
है
उसका
दिल
बेकरार
होता
है
माँ
का
साया
जहाँ
नहीं
होता
घर
वो
उजड़ा
दयार
होता
है
छीन
कर
हक
किसी
का
यूँँ
जीना
दिल
पे
अपने
तो
बार
होता
है
चोट
लगती
है
जब
भी
अपनों
से
ग़ैरों
पर
ऐतबार
होता
है
हम
जियें
कैसे
यूँँ
उसूलों
पर
हम
से
हरगिज़
न
यार
होता
है
कोई
हम
को
कलाम
बतलाऐ
जाने
कैसे
ये
प्यार
होता
है
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सुकूँ
प्यारे
उलफ़त
का
छाया
हुआ
है
अँधेरा
भी
घर
का
पराया
हुआ
है
तसव्वुर
का
तेरे
ये
अदना
है
जादू
दिया
जैसे
शब
में
जलाया
हुआ
है
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Maviya abdul kalam khan
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दिल
की
बेताबियाँ
बड़ाने
की
क्या
ज़रूरत
थी
सज
के
आने
की
कुछ
हमें
भी
तबीब
बतला
दो
है
दवा
कोई
ग़म
भुलाने
की
वो
न
माने
मनाने
पर
फिर
भी
हम
ने
छोड़ी
न
जिद
मनाने
की
उन
को
जा
कर
हुआ
है
अर्सा
पर
आस
अब
भी
है
उन
के
आने
की
फाखा
कश
हैं
पडोस
में
लेकिन
है
ख़बर
किसको
उस
घराने
की
उन
को
फ़ुर्सत
कहाँ
के
देखे
वो
आके
हालत
को
इस
दिवाने
की
हार
कैसे
'कलाम'
मानें
हम
हम
को
आदत
है
जीत
जाने
की
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Maviya abdul kalam khan
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दु'आ
को
ख़ुदाया
मेरी
बा-असर
कर
मुझे
साजिशों
से
सदा
बा-ख़बर
कर
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