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Maviya abdul kalam khan
sukoon pyaare ulfat ka chaaya hua hai
sukoon pyaare ulfat ka chaaya hua hai | सुकूँ प्यारे उलफ़त का छाया हुआ है
- Maviya abdul kalam khan
सुकूँ
प्यारे
उलफ़त
का
छाया
हुआ
है
अँधेरा
भी
घर
का
पराया
हुआ
है
तसव्वुर
का
तेरे
ये
अदना
है
जादू
दिया
जैसे
शब
में
जलाया
हुआ
है
- Maviya abdul kalam khan
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रात
बाक़ी
थी
जब
वो
बिछड़े
थे
कट
गई
उम्र
रात
बाक़ी
है
Khumar Barabankvi
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तेरी
आँखों
के
लिए
इतनी
सज़ा
काफ़ी
है
आज
की
रात
मुझे
ख़्वाब
में
रोता
हुआ
देख
Abhishek shukla
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अँधेरा
खो
गया
है
गाँव
वालों
सवेरा
हो
गया
है
गाँव
वालों
तुम्हें
अब
जागना
ख़ुद
ही
पड़ेगा
ये
मुर्गा
सो
गया
है
गाँव
वालों
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Divy Kamaldhwaj
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जागना
और
जगा
के
सो
जाना
रात
को
दिन
बना
के
सो
जाना
Ali Zaryoun
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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रात
आ
कर
गुज़र
भी
जाती
है
इक
हमारी
सहर
नहीं
होती
Ibn E Insha
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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तस्वीर
में
जो
क़ैद
था
वो
शख़्स
रात
को
ख़ुद
ही
फ़्रेम
तोड़
के
पहलू
में
आ
गया
Adil Mansuri
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अजीब
सानेहा
मुझ
पर
गुज़र
गया
यारो
मैं
अपने
साए
से
कल
रात
डर
गया
यारो
Shahryar
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ज़मीं
चाँद
व
सूरज
सितारे
ख़ुदा
के
हसीं
ख़ूब-सूरत
नज़ारे
ख़ुदा
के
खिलाता
है
सब
को
ख़ुदा
ही
तो
देखो
जहाँ
में
सभी
को
सहारे
ख़ुदा
के
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Maviya abdul kalam khan
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रंजिशों
से
जुदा
रास्ते
हो
गए
और
फिर
दरमियाँ
फ़ासले
हो
गए
हम
जहाँ
से
चले
आ
गए
फिर
वहीं
रक्स-ए
हालात
से
दाएरे
हो
गए
शीरीं
पैराए
में
जब
भी
की
गुफ्तगू
हम
तो
गिरवीदा
बस
आपके
हो
गए
गांव
जलता
रहा
वो
तमाशाई
थे
उनके
शहरों
में
भी
हादसे
हो
गए
अपने
हो
कर
भी
थे
जो
कभी
अजनबी
हाजतों
के
सबब
वास्ते
हो
गए
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जिस
पे
लफ़्ज़ों
का
वार
होता
है
उसका
दिल
बेकरार
होता
है
माँ
का
साया
जहाँ
नहीं
होता
घर
वो
उजड़ा
दयार
होता
है
छीन
कर
हक
किसी
का
यूँँ
जीना
दिल
पे
अपने
तो
बार
होता
है
चोट
लगती
है
जब
भी
अपनों
से
ग़ैरों
पर
ऐतबार
होता
है
हम
जियें
कैसे
यूँँ
उसूलों
पर
हम
से
हरगिज़
न
यार
होता
है
कोई
हम
को
कलाम
बतलाऐ
जाने
कैसे
ये
प्यार
होता
है
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दिल
की
बेताबियाँ
बड़ाने
की
क्या
ज़रूरत
थी
सज
के
आने
की
कुछ
हमें
भी
तबीब
बतला
दो
है
दवा
कोई
ग़म
भुलाने
की
वो
न
माने
मनाने
पर
फिर
भी
हम
ने
छोड़ी
न
जिद
मनाने
की
उन
को
जा
कर
हुआ
है
अर्सा
पर
आस
अब
भी
है
उन
के
आने
की
फाखा
कश
हैं
पडोस
में
लेकिन
है
ख़बर
किसको
उस
घराने
की
उन
को
फ़ुर्सत
कहाँ
के
देखे
वो
आके
हालत
को
इस
दिवाने
की
हार
कैसे
'कलाम'
मानें
हम
हम
को
आदत
है
जीत
जाने
की
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तन्हा
ही
लड़
रहा
हूँ
मैं
हालात
से
यहाँ
कहने
को
मेरे
साथ
में
सारा
जहान
है
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