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Maviya abdul kalam khan
dil ki betaabiyaan badaane ki
dil ki betaabiyaan badaane ki | दिल की बेताबियाँ बड़ाने की
- Maviya abdul kalam khan
दिल
की
बेताबियाँ
बड़ाने
की
क्या
ज़रूरत
थी
सज
के
आने
की
कुछ
हमें
भी
तबीब
बतला
दो
है
दवा
कोई
ग़म
भुलाने
की
वो
न
माने
मनाने
पर
फिर
भी
हम
ने
छोड़ी
न
जिद
मनाने
की
उन
को
जा
कर
हुआ
है
अर्सा
पर
आस
अब
भी
है
उन
के
आने
की
फाखा
कश
हैं
पडोस
में
लेकिन
है
ख़बर
किसको
उस
घराने
की
उन
को
फ़ुर्सत
कहाँ
के
देखे
वो
आके
हालत
को
इस
दिवाने
की
हार
कैसे
'कलाम'
मानें
हम
हम
को
आदत
है
जीत
जाने
की
- Maviya abdul kalam khan
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तुम
सेे
मिल
कर
इतनी
तो
उम्मीद
हुई
है
इस
दुनिया
में
वक़्त
बिताया
जा
सकता
है
Manoj Azhar
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हिम्मत,
ताकत,
प्यार,
भरोसा
जो
है
सब
इनसे
ही
है
कुछ
नंबर
हैं
जिन
पर
मैंने
अक्सर
फोन
लगाया
है
Pratap Somvanshi
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल,
तो
जुस्तजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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तेरे
आने
की
इक
उम्मीद
है
और
इसी
उम्मीद
पर
क़ाएम
है
दुनिया
Shubham Sarkar
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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चलते
हुए
मुझ
में
कहीं
ठहरा
हुआ
तू
है
रस्ता
नहीं
मंज़िल
नहीं
अच्छा
हुआ
तू
है
Abhishek shukla
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दर्द
में
शिद्दत-ए-एहसास
नहीं
थी
पहले
ज़िंदगी
राम
का
बन-बास
नहीं
थी
पहले
Shakeel Azmi
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यार
आसान
होती
नहीं
यह
कला
मौन
रहना
बड़ी
ही
चुनौती
रही
Aniket sagar
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मैदाँ
में
हार
जीत
का
यूँँ
फ़ैसला
हुआ
दुनिया
थी
उन
के
साथ
हमारा
ख़ुदा
हुआ
Jameel Malik
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रंजिशों
से
जुदा
रास्ते
हो
गए
और
फिर
दरमियाँ
फ़ासले
हो
गए
हम
जहाँ
से
चले
आ
गए
फिर
वहीं
रक्स-ए
हालात
से
दाएरे
हो
गए
शीरीं
पैराए
में
जब
भी
की
गुफ्तगू
हम
तो
गिरवीदा
बस
आपके
हो
गए
गांव
जलता
रहा
वो
तमाशाई
थे
उनके
शहरों
में
भी
हादसे
हो
गए
अपने
हो
कर
भी
थे
जो
कभी
अजनबी
हाजतों
के
सबब
वास्ते
हो
गए
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सुकूँ
प्यारे
उलफ़त
का
छाया
हुआ
है
अँधेरा
भी
घर
का
पराया
हुआ
है
तसव्वुर
का
तेरे
ये
अदना
है
जादू
दिया
जैसे
शब
में
जलाया
हुआ
है
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Maviya abdul kalam khan
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ज़मीं
चाँद
व
सूरज
सितारे
ख़ुदा
के
हसीं
ख़ूब-सूरत
नज़ारे
ख़ुदा
के
खिलाता
है
सब
को
ख़ुदा
ही
तो
देखो
जहाँ
में
सभी
को
सहारे
ख़ुदा
के
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गिरता
हूँ
तो
फौरन
मुझे
उढने
नहीं
देती
हालात
की
संगीनी
सँभलने
नहीं
देती
Maviya abdul kalam khan
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रहकर
के
भीड़
में
भी
जो
तन्हा
हुआ
हूँ
मैं
कैसे
बताऊँ
यार
के
टूटा
हुआ
हूँ
मैं
मुझको
कहाँ
कहाँ
से
समेटोगे
तुम
भला
अपनों
के
दरमियान
जो
बिखरा
हुआ
हूँ
मैं
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Maviya abdul kalam khan
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