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Vijay Anand Mahir
tumhein jab padegi zaroorat hamaari
tumhein jab padegi zaroorat hamaari | तुम्हें जब पड़ेगी ज़रूरत हमारी
- Vijay Anand Mahir
तुम्हें
जब
पड़ेगी
ज़रूरत
हमारी
पता
तब
चलेगी
मुहब्बत
हमारी
जिन्हें
भी
मुयस्सर
हो
ग़म
ख़्वार
अपना
समझ
क्या
सकेंगे
वो
हालत
हमारी
कहा
जब
मुझे
आप
अपना
बना
लो
लगाने
लगे
लोग
क़ीमत
हमारी
चराग़ों
में
अब
रोशनी
आ
गई
है
तभी
हो
रही
इतनी
ख़िदमत
हमारी
तुम्हारे
तसव्वुर
में
जो
आ
रही
है
रक़ीबों
कभी
थी
वो
चाहत
हमारी
रहेगा
यही
रंज
'माहिर'
हमेसा
हमें
मिल
न
पाई
मुहब्बत
हमारी
- Vijay Anand Mahir
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उदासी
का
सबब
उस
सेे
जो
हम
तब
पूछ
लेते
वजह
फिर
पूछनी
पड़ती
न
शायद
ख़ुद-कुशी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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हाए
उसके
हाथ
पीले
होने
का
ग़म
इतना
रोए
हैं
कि
आँखें
लाल
कर
ली
Harsh saxena
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वक़्त
की
गर्दिशों
का
ग़म
न
करो
हौसले
मुश्किलों
में
पलते
हैं
Mahfuzur Rahman Adil
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ख़ुशी
में
भी
ख़ुशी
होती
नहीं
अब
तेरा
ग़म
ही
सतह
पर
तैरता
है
Umesh Maurya
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मज़ाक
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
Swapnil Tiwari
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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आज
तो
बे-सबब
उदास
है
जी
इश्क़
होता
तो
कोई
बात
भी
थी
Nasir Kazmi
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नहीं
है
लब
पे
दिखावे
का
भी
तबस्सुम
अब
हमें
किसी
ने
मुक़म्मल
उदास
कर
दिया
है
Amaan Haider
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लाज़िम
है
अब
कि
आप
ज़ियादा
उदास
हों
इस
शहर
में
बचे
हैं
बहुत
कम
उदास
लोग
Bhaskar Shukla
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तुझको
पाते
तो
कब
के
मर
जाते
तेरी
यादों
ने
ज़िंदा
रक्खा
है
Vijay Anand Mahir
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कभी
फिर
तू
न
बोलेगा
मोहब्बत
हो
ज़रा
मेरी
नज़र
से
देख
ये
दुनिया
Vijay Anand Mahir
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घर
ख़ाली
है
रो
सकता
हूँ
या'नी
ख़ुद
का
हो
सकता
हूँ
अब
तुम,मेरा
हाथ
पकड़
लो
मैं
दुनिया
में
खो
सकता
हूँ
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Vijay Anand Mahir
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पाक
हो
या
के
हो
नापाक
बदन
होंगे
इक
रोज़
सभी
ख़ाक
बदन
Vijay Anand Mahir
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दुखी
होने
लगे
जब
हम
ग़ज़ल
कह
दी
हुई
आँखें
मिरी
जब
नम
ग़ज़ल
कह
दी
नज़र
आया,
लगा
अपना,
मुझे
कोई
न
बोले,
आ
गए
घर
हम
ग़ज़ल
कह
दी
बिछड़
के
जा
रहा
था
दूर
ख़ुद
से
मैं
तभी
ऐसा
बना
आलम
ग़ज़ल
कह
दी
टपकता
था
लबों
से
पानी
बारिश
का
बदन
भीगा,
हसीं
मौसम
ग़ज़ल
कह
दी
उसे
मालूम
हो
क्या
हाल
मेरा
है
लिखे
सारे-के-सारे
ग़म
ग़ज़ल
कह
दी
क़लम
ने
ख़ूब
फिर
ता'रीफ़
की
'माहिर'
किया
अच्छा
जो
ये
हमदम
ग़ज़ल
कह
दी
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Vijay Anand Mahir
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