bahla rahe hain dil ko gham-e-zindagi se ham | बहला रहे हैं दिल को ग़म-ए-ज़िंदगी से हम

  - Khawaja Imtiaz Kavish
बहलारहेहैंदिलकोग़म-ए-ज़िंदगीसेहम
लेतेरहेहैंकुछतोमज़ेख़ुद-कुशीसेहम
नग़्मेंतिरेलिएहीलिखेरातदिनसभी
कबसूदपासकेंगेतिरीबंदगीसेहम
गरजोहमारेदिलकोयेरौशनकरसके
तोफिरउलझपड़ेंगेइसीचाँदनीसेहम
अव्वलमिलेनहींजोमिलेभीतोरोपड़े
कुछइसतरहख़फ़ाहुएउसअजनबीसेहम
बसइसलिएकेदिलकीतरहजलजाएघर
डरतेरहेंगेशम्ओंसेभीरौशनीसेहम
हैइसजहाँसेहमकोकोईख़ौफ़तोनहीं
मरजाएँगेबिचारेतिरीबे-रुख़ीसेहम
तुमकोख़बरभीहोनेपाएगीबे-ख़बर
रुख़्सतजहाँसेलेंगेमगरख़ामुशीसेहम
दिनजोभीज़िंदगीकेबचेथेवोसबकेसब
लोकरगएतुम्हारेहवालेख़ुशीसेहम
गरजोख़ुदालुटादेहमेंज़िंदगीतोफिर
'काविश'जहाँमेंदिललगाएँकिसीसेहम
  - Khawaja Imtiaz Kavish
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