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Hasan Raqim
ye uske uns men jalte deeyon ki raushni isko
ye uske uns men jalte deeyon ki raushni isko | ये उसके उन्स में जलते दीयों की रौशनी, इसको
- Hasan Raqim
ये
उसके
उन्स
में
जलते
दीयों
की
रौशनी,
इसको
बढ़ा
गर
वो
नहीं
सकता
बुझा
मैं
भी
नहीं
सकता
- Hasan Raqim
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यह
जानते
हैं
हम
या
ख़ुदा
जानता
है
बस
कैसे
निकल
के
आए
हैं
उस
तीरगी
से
हम
Amaan Pathan
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अब
तो
ख़ुद
अपने
ख़ून
ने
भी
साफ़
कह
दिया
मैं
आपका
रहूॅंगा
मगर
उम्र
भर
नहीं
Aalok Shrivastav
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आएगा
वो
दिन
हमारी
ज़िंदगी
में
भी
ज़रूर
जो
अँधेरों
को
मिटा
कर
रौशनी
दे
जाएगा
Anwar Taban
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इतना
सच
बोल
कि
होंटों
का
तबस्सुम
न
बुझे
रौशनी
ख़त्म
न
कर
आगे
अँधेरा
होगा
Nida Fazli
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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लड़कियाँ
बैठी
थीं
पाँव
डालकर
रौशनी
सी
हो
गई
तालाब
में
Parveen Shakir
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उम्र
गुज़री
है
माँजते
ख़ुद
को
साफ़
हैं
पर
चमक
नहीं
पाए
डाल
ने
फूल
की
तरह
पाला
ख़ार
थे
ना
महक
नहीं
पाए
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Vishal Bagh
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हल्की-हल्की
सी
हँसी,
साफ
इशारा
भी
नहीं
जान
भी
ले
गए
और,
जान
से
मारा
भी
नहीं
Sawan Shukla
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मुफ़लिसी
थी
और
हम
थे
घर
के
इकलौते
चराग़
वरना
ऐसी
रौशनी
करते
कि
दुनिया
देखती
Kashif Sayyed
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ख़ुद
मुझको
समझने
में
मुझे
उम्र
लग
गई
कैसे
मैं
तुम्हें
आऊँ
समझ
एक
बार
में?
Hasan Raqim
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कैसे
मानें
कि
बात
कोई
नहीं
आँख
पहले
तो
इतना
रोई
नहीं
वो
जहाँ
हैं
वहाँ
पे
सब
ही
तो
हैं
हम
जहाँ
हैं
वहाँ
पे
कोई
नहीं
पूछते
क्या
हो
चाँद
तारों
से
टूटते
दिल
की
पेशगोई
नहीं
रौशनी
को
हैं
लाखों
परवाने
हम
अँधेरो
के
पास
कोई
नहीं
जिस्म
भी
ऐसा
उम्र
भर
जागा
रूह
भी
ऐसी
तब
से
सोई
नहीं
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Hasan Raqim
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सादगी
से
यूँँ
गुज़र
जाए
ये
जीवन
एक
प्याली
चाय
भी
हो
यार
भी
हो
Hasan Raqim
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अगर
दिए
सा
भी
कम
होता
ज़िंदगी
का
वक़्त
गुज़ार
देता
तेरे
साथ
में
वो
सारा
वक़्त
वो
बात
करती
थी
जब
उसको
वक़्त
मिलता
था,
मैं
बात
करने
की
ख़ातिर
निकालता
था
वक़्त
उसे
ख़बर
भी
नहीं
थी
मगर
ये
ग़म
था
मुझे,
उसे
हँसाता
था
मुझ
को
रुलाने
वाला
वक़्त
किसी
दिए
सा
ही
रोशन
हुआ
था
वक़्त
अपना
किसी
दिए
की
तरह
ही
ये
जा
बुझेगा
वक़्त
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Hasan Raqim
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मैं
उनको
हाल-ए-ग़म
अपना
सुना
देता
मगर
"राक़िम"
मोहब्बत
करने
वाले
फिर
मोहब्बत
कर
नहीं
पाते
Hasan Raqim
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