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Hasan Raqim
agar diye sa bhi kam hota zindagi ka vaqt
agar diye sa bhi kam hota zindagi ka vaqt | अगर दिए सा भी कम होता ज़िंदगी का वक़्त
- Hasan Raqim
अगर
दिए
सा
भी
कम
होता
ज़िंदगी
का
वक़्त
गुज़ार
देता
तेरे
साथ
में
वो
सारा
वक़्त
वो
बात
करती
थी
जब
उसको
वक़्त
मिलता
था,
मैं
बात
करने
की
ख़ातिर
निकालता
था
वक़्त
उसे
ख़बर
भी
नहीं
थी
मगर
ये
ग़म
था
मुझे,
उसे
हँसाता
था
मुझ
को
रुलाने
वाला
वक़्त
किसी
दिए
सा
ही
रोशन
हुआ
था
वक़्त
अपना
किसी
दिए
की
तरह
ही
ये
जा
बुझेगा
वक़्त
- Hasan Raqim
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ज़िंदगी
तू
ने
मुझे
क़ब्र
से
कम
दी
है
ज़मीं
पाँव
फैलाऊँ
तो
दीवार
में
सर
लगता
है
Bashir Badr
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हाल
मत
पूछो
हमारी
ज़िंदगी
का
एक
चलती-फिरती
सी
दीवार
है
बस
Rachit Sonkar
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हाए
क्या
दौर-ए-ज़िंदगी
गुज़रा
वाक़िए
हो
गए
कहानी
से
Gulzar Dehlvi
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वो
मेरी
ज़िन्दगी
का
आख़िरी
ग़म
था
उसी
ने
मुझको
ख़ुश
रहना
सिखाया
है
Sapna Moolchandani
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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जब
से
हुआ
है
कंधे
से
बस्ते
का
बोझ
कम
बढ़ते
ही
जा
रहे
हैं
मेरी
ज़िंदगी
में
ग़म
Ankit Maurya
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तंग
आ
चुके
हैं
कशमकश-ए-ज़िंदगी
से
हम
ठुकरा
न
दें
जहाँ
को
कहीं
बे-दिली
से
हम
Sahir Ludhianvi
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जो
गुज़ारी
न
जा
सकी
हम
से
हम
ने
वो
ज़िन्दगी
गुज़ारी
है
Jaun Elia
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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तुम
भी
साबित
हुए
कमज़ोर
मुनव्वर
राना
ज़िन्दगी
माँगी
भी
तुमने
तो
दवा
से
माँगी
Munawwar Rana
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सादगी
से
यूँँ
गुज़र
जाए
ये
जीवन
एक
प्याली
चाय
भी
हो
यार
भी
हो
Hasan Raqim
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ख़ुद
मुझको
समझने
में
मुझे
उम्र
लग
गई
कैसे
मैं
तुम्हें
आऊँ
समझ
एक
बार
में?
Hasan Raqim
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था
इब्तिदास
इश्क़
के
दिए
जलाने
वाला
मैं
हुआ
हूँ
ख़ुद
ही
इनकी
रौशनी
बुझाने
वाला
मैं
मुझे
फ़क़त
उसी
से
इश्क़
है
ये
सच
तो
है
मगर
उसे
बता
के
उसका
दिल
नहीं
दुखाने
वाला
मैं
मैं
सब
सेे
रूठ
जाऊँ
तो
मुझे
मनाने
वाला
वो
वो
सब
सेे
रूठ
जाए
तो
उसे
मनाने
वाला
मैं
मैं
आज
उस
सेे
आख़िरी
दफ़ा
मिला
तो
ये
लगा
बहुत
ग़लत
था
उस
सेे
दूरियाँ
बढ़ाने
वाला
मैं
तो
कह
सकूँगा,
ज़िंदगी
उसूलों
पर
गुज़र
गई
कभी
जो
बन
सकूँगा
उसके
काम
आने
वाला
मैं
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Hasan Raqim
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सोचता
हूँ
ये
भी
कैसी
दिल-लगी
अच्छी
लगी
वो
भी
अच्छा
और
उसकी
बेरुखी
अच्छी
लगी
क्या
मुसीबत
है
तिरे
जाने
पे
तेरा
इंतज़ार
और
आने
पे
तेरे,
तेरी
कमी
अच्छी
लगी
वो
ग़मो
के
साए
में
रहते
रहे
हैं
इसलिए
रौशनी
होते
भी
उनको
तीरगी
अच्छी
लगी
कौन
है
राज़ी
फ़रेब-ए-गर्दिश-ए-अय्याम
से
मौत
से
पहले
किसे
ही
ज़िंदगी
अच्छी
लगी
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याद
आता
है
मुझे,
उसका
फसाना
भी
बहुत
और
मुश्किल
है
उसे
दिल
से
मिटाना
भी
बहुत
मुझको
ख़्वाबों
में
फ़क़त
आता
है
तू
ही
तू
नज़र
और
होता
है
तेरी
यादों
का
आना
भी
बहुत
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Hasan Raqim
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