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Hasan Raqim
sochta hooñ ye bhi kaisi dil
sochta hooñ ye bhi kaisi dil | सोचता हूँ ये भी कैसी दिल-लगी अच्छी लगी
- Hasan Raqim
सोचता
हूँ
ये
भी
कैसी
दिल-लगी
अच्छी
लगी
वो
भी
अच्छा
और
उसकी
बेरुखी
अच्छी
लगी
क्या
मुसीबत
है
तिरे
जाने
पे
तेरा
इंतज़ार
और
आने
पे
तेरे,
तेरी
कमी
अच्छी
लगी
वो
ग़मो
के
साए
में
रहते
रहे
हैं
इसलिए
रौशनी
होते
भी
उनको
तीरगी
अच्छी
लगी
कौन
है
राज़ी
फ़रेब-ए-गर्दिश-ए-अय्याम
से
मौत
से
पहले
किसे
ही
ज़िंदगी
अच्छी
लगी
- Hasan Raqim
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तुम
तो
सर्दी
की
हसीं
धूप
का
चेहरा
हो
जिसे
देखते
रहते
हैं
दीवार
से
जाते
हुए
हम
Nomaan Shauque
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लड़कियाँ
बैठी
थीं
पाँव
डालकर
रौशनी
सी
हो
गई
तालाब
में
Parveen Shakir
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सभी
के
दीप
सुंदर
हैं
हमारे
क्या
तुम्हारे
क्या
उजाला
हर
तरफ़
है
इस
किनारे
उस
किनारे
क्या
Hafeez Banarasi
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मिरी
रौशनी
तिरे
ख़द्द-ओ-ख़ाल
से
मुख़्तलिफ़
तो
नहीं
मगर
तू
क़रीब
आ
तुझे
देख
लूँ
तू
वही
है
या
कोई
और
है
Saleem Kausar
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धूप
निकली
है
बारिशों
के
ब'अद
वो
अभी
रो
के
मुस्कुराए
हैं
Anjum Ludhianvi
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सुख़न-फ़हमों
की
बस्ती
में
सुख़न
की
ज़िन्दगी
कम
है
जहाँ
शाइर
ज़ियादा
हैं
वहाँ
पर
शा'इरी
कम
है
मैं
जुगनू
हूँ
उजाले
में
भला
क्या
अहमियत
मेरी
वहाँ
ले
जाइए
मुझको
जहाँ
पर
रौशनी
कम
है
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Balmohan Pandey
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ये
भँवरे
रौशनी
खो
देंगे
अपनी
आँखों
की
अगर
चमन
में
जो
कलियाँ
नक़ाब
ओढेंगी
Shajar Abbas
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झूट
पर
उसके
भरोसा
कर
लिया
धूप
इतनी
थी
कि
साया
कर
लिया
Shariq Kaifi
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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तेज़
धूप
में
आई
ऐसी
लहर
सर्दी
की
मोम
का
हर
इक
पुतला
बच
गया
पिघलने
से
Qateel Shifai
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गर
उसके
दिल
से
मेरा
दिल
लगा
नहीं
होता
तो
उसके
जाने
का
मुझको
गिला
नहीं
होता
ये
ख़ामुशी,
ये
कमी,
चीखती
नहीं
होती
मोहब्बतों
का
ये
ग़म
काटता
नहीं
होता
पराए
लोग
मिले
और
कह
गए
मुझ
सेे
कि
इस
जहान
में
कोई
सगा
नहीं
होता
असर
ये
माँ
की
दु'आओं
का
ही
तो
है
ऐ
दोस्त
कि
होते
होते
कोई
हादसा
नहीं
होता
वो
लौट
आएगा
गर
ये
यक़ीं
नहीं
होता
तो
इंतज़ार
में
उसके
रुका
नहीं
होता
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Hasan Raqim
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तुम्हारे
बाद
ये
हालात
हैं
कि
लगता
है
तुम्हारे
साथ
मुलाक़ात
एक
ग़लती
थी
Hasan Raqim
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रास्ता
दिल
का
ज़रा
गुलज़ार
भी
हो
और
मंज़िल
ढूँढ़ना
दुश्वार
भी
हो
सादगी
से
यूँँ
गुज़र
जाए
ये
जीवन
एक
प्याली
चाय
भी
हो
यार
भी
हो
वो
तुम्हारे
पास
आकर
बैठता
हो
ये
ज़रूरी
तो
नहीं
ना
प्यार
भी
हो
इश्क़
भी
हो
और
हो
इज़हार
यानी
पेड़
साया
भी
करे
फलदार
भी
हो
कोई
दरिया
देखकर
गोता
लगाए
कोई
पत्थर
आसमाँ
के
पार
भी
हो
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Hasan Raqim
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असर
ये
माँ
की
दु'आओं
का
ही
तो
है
ऐ
दोस्त
कि
होते
होते
कोई
हादसा
नहीं
होता
Hasan Raqim
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मुझे
ये
ग़म
है
कि
मैं
अपना
इश्क़
पा
नहीं
सका
और
उसपे
ये
सितम
कि
तुझ
सेे
दूर
जा
नहीं
सका
वो
मेरे
दिल
में
अपनी
आरज़ू
की
लौ
जला
गया
मैं
चाहते
हुए
भी
ये
दीए
बुझा
नहीं
सका
फ़क़त
वो
एक
फूल
अपनी
डाल
से
जुदा
हुआ,
फिर
उसके
बाद
सारा
बाग़
मुस्कुरा
नहीं
सका
वो
शख़्स
मुझको
भूल
भी
गया
है,
मैं
मगर
उसे
तमाम
कोशिशों
के
बाद
भी
भुला
नहीं
सका
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Hasan Raqim
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