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Gulfam Ajmeri
dekhooñ jo KHud ko dikhta hai bas us ka aks
dekhooñ jo KHud ko dikhta hai bas us ka aks | देखूँ जो ख़ुद को दिखता है बस उस का अक्स
- Gulfam Ajmeri
देखूँ
जो
ख़ुद
को
दिखता
है
बस
उस
का
अक्स
सो
सारे
आईने
जला
के
बैठा
हूँ
उस
ने
कहा
था
लौट
कर
आऊँगा
मैं
जब
से
नज़र
दर
पे
लगा
के
बैठा
हूँ
- Gulfam Ajmeri
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हम
किसी
दर
पे
न
ठिटके
न
कहीं
दस्तक
दी
सैकड़ों
दर
थे
मिरी
जाँ
तिरे
दर
से
पहले
Ibn E Insha
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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जाने
से
कोई
फ़र्क़
ही
उसके
नहीं
पड़ा
क्या
क्या
समझ
रहा
था
बिछड़ने
के
डर
को
मैं
Shariq Kaifi
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मज़ा
चहिए
जो
आख़िर
तक
उदासी
से
मोहब्बत
कर
ख़ुशी
का
क्या
है
कब
तब्दील
है
से
थी
में
हो
जाए
Atul K Rai
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यूँँ
देखिए
तो
आँधी
में
बस
इक
शजर
गया
लेकिन
न
जाने
कितने
परिंदों
का
घर
गया
जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
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Rajesh Reddy
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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मौत
को
हम
ने
कभी
कुछ
नहीं
समझा
मगर
आज
अपने
बच्चों
की
तरफ़
देख
के
डर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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सुन
तिरे
बाद
क्या
क्या
हुआ
मेरे
साथ
वो
हुआ
जो
नहीं
होना
था
मेरे
साथ
कौन
करता
है
बर्बाद
किस
को
यहाँ
ज़िंदगी
शर्त
कोई
लगा
मेरे
साथ
वो
जो
आया
था
देने
दिलासा
मुझे
यूँँ
हुआ
वो
भी
रोने
लगा
मेरे
साथ
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Gulfam Ajmeri
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सब
पूछते
हैं
इस
उदासी
का
सबब
रो
देते
हैं
लेकिन
उगलते
कुछ
नहीं
Gulfam Ajmeri
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यार
तुम
भी
कमाल
करते
हो
इश्क़
कर
के
ये
हाल
करते
हो
अपने
ही
हाथों
हम
हुए
बर्बाद
आप
फिर
क्यूँँ
मलाल
करते
हो
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Gulfam Ajmeri
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मुहब्बत
आठवीं
कर
तो
लें
हम
भी
पर
ज़रा
सातों
का
दुख
भी
कम
हुआ
होता
नहीं
की
ख़ुद-कुशी
यह
सोच
कर
मैंने
फ़क़त
अब
मौत
से
भी
मेरा
क्या
होता
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Gulfam Ajmeri
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तेरे
बाद
क्या
ये
ख़ाक
ज़िन्दगी
रही
और
मिरा
पता
उदासी
पूछती
रही
मेरे
यार
मुझ
को
हिज्र
खा
गया
तिरा
और
मेरी
माँ
नज़र
उतारती
रही
तुम
तो
उठ
के
चल
दिए
मिरे
क़रीब
से
मेरी
ख़ामुशी
तुम्हें
पुकारती
रही
मेरे
सारे
ख़्वाब
जल
के
राख
हो
गए
और
इधर
हवा
चराग़
ढूँढती
रही
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Gulfam Ajmeri
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