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Gulfam Ajmeri
tere baad kya ye KHaak zindagi rahi
tere baad kya ye KHaak zindagi rahi | तेरे बाद क्या ये ख़ाक ज़िन्दगी रही
- Gulfam Ajmeri
तेरे
बाद
क्या
ये
ख़ाक
ज़िन्दगी
रही
और
मिरा
पता
उदासी
पूछती
रही
मेरे
यार
मुझ
को
हिज्र
खा
गया
तिरा
और
मेरी
माँ
नज़र
उतारती
रही
तुम
तो
उठ
के
चल
दिए
मिरे
क़रीब
से
मेरी
ख़ामुशी
तुम्हें
पुकारती
रही
मेरे
सारे
ख़्वाब
जल
के
राख
हो
गए
और
इधर
हवा
चराग़
ढूँढती
रही
- Gulfam Ajmeri
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हमारे
साथ
है
साया
हमारा
तो
भी
चेहरा
है
क्यूँँ
धुँधला
हमारा
इसे
है
हम
से
शिकवे
फिर
भी
लेकिन
नहीं
कर
सकती
कुछ
दुनिया
हमारा
किसी
भी
बात
पर
रोती
न
थी
जो
लहू
फिर
आँख
से
टपका
हमारा
पता
जैसे
चला
दिल
टूटने
का
उतारा
फिर
गया
पंखा
हमारा
चले
थे
साथ
जीने
और
मरने
अलग
हो
ही
गया
रस्ता
हमारा
न
जाने
गुम
कहाँ
है
नामा-बर
भी
अभी
तक
ख़त
नहीं
पहुँचा
हमारा
मैं
उस
से
हँस
के
बातें
कर
रहा
था
तो
ग़म
तकता
रहा
चेहरा
हमारा
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जब
हाथ
उसका
पकड़ा
तो
कहने
लगी
मेरी
सुनो
शादी
से
पहले
कुछ
नहीं
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तुम
ख़ुदा
ख़ुद
को
अगर
जो
मानते
हो
हिज्र
में
मर
जाने
का
ग़म
जानते
हो
?
मैं
वहीं
हूँ
जो
तुम्हारे
साथ
रोया
तुम
तो
हम
को
अब
कहा
पहचानते
हो
जब
था
ज़िंदा
तो
नहीं
ली
आपने
सुद
बैठ
के
अब
कैसे
मिट्टी
छानते
हो
?
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अजब
अंदाज़
से
ये
घर
गिरा
है
मिरा
मलबा
मिरे
ऊपर
गिरा
है
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ग़ैर
के
साथ
वो
नज़र
आया
अश्क
आँखों
से
फिर
उतर
आया
साक़ी
मुझ
को
शराब
मत
देना
आज
जी
पी
के
मेरा
भर
आया
थक
गई
आँखें
रास्ता
तकते
लौट
के
वो
न
उम्र
भर
आया
पी
थी
जिसको
भुलाने
की
ख़ातिर
याद
वो
मुझ
को
रात
भर
आया
बाद
तेरे
न
कुछ
सुना
मैंने
बाद
तेरे
न
कुछ
नज़र
आया
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