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Gulfam Ajmeri
jab haath uskaa pakda to kehne lagii
jab haath uskaa pakda to kehne lagii | जब हाथ उसका पकड़ा तो कहने लगी
- Gulfam Ajmeri
जब
हाथ
उसका
पकड़ा
तो
कहने
लगी
मेरी
सुनो
शादी
से
पहले
कुछ
नहीं
- Gulfam Ajmeri
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सारे
का
सारा
तो
मेरा
भी
नहीं
और
वो
शख़्स
बे-वफ़ा
भी
नहीं
ग़ौर
से
देखने
पे
बोली
है
शादी
से
पहले
सोचना
भी
नहीं
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Kushal Dauneria
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पहले
थोड़ी
मुश्किल
होगी
आगे
लेकिन
मंज़िल
होगी
सब
बाराती
शायर
होंगे
मेरी
शादी
महफ़िल
होगी
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Tanoj Dadhich
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हम
चाह
कर
भी
टूटते
हैं
हर
दफ़ा
होता
यही
है
इश्क़
का
क्या
क़ायदा
हर
वक़्त
तुम
यूँँ
याद
आते
हो
मुझे
जैसे
नई
दुल्हन
करे
मिस
मायका
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Harsh saxena
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इसलिए
ये
महीना
ही
शामिल
नहीं
उम्र
की
जंत्री
में
हमारी
उसने
इक
दिन
कहा
था
कि
शादी
है
इस
फरवरी
में
हमारी
Tehzeeb Hafi
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दुल्हन
बनी
हुई
हैं
राहें
जश्न
मनाओ
साल-ए-नौ
के
Sahir Ludhianvi
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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वो
मिरे
सामने
दुल्हन
की
तरह
बैठे
हैं
ख़्वाब
अच्छा
है
मगर
ख़्वाब
में
क्या
रक्खा
है
Muzaffar Razmi
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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केवल
उसका
हाथ
मेरी
बर्बादी
में
और
तो
कोई
ऐब
नहीं
शहज़ादी
में
प्यार
बहुत
करता
था
उस
सेे
मैं
लेकिन
प्यार
नहीं
देखा
जाता
है
शादी
में
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Tanoj Dadhich
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मुहब्बत
से
पहले
हमारी
मुहब्बत
के
चर्चे
हो
जाना
बड़ी
आम
सी
बात
है
इस
मुहब्बत
में
झगड़े
हो
जाना
चला
जाऊँ
मैं
भी
अगर
छोड़
कर
तुम
को
तन्हा
कहीं
पे
तुम्हारा
भी
बनता
है
तुम
भी
किसी
दूसरे
के
हो
जाना
पिता
जी
के
कहने
पे
उस
लड़की
ने
बात
तो
मान
ली
माँ
ये
तो
छोटी
सी
बात
है
ख़ुद-कुशी
जैसे
क़िस्से
हो
जाना
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Gulfam Ajmeri
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वैसे
इसका
तो
इरादा
भी
नहीं
जीने
का
अब
फिर
भी
चारा-गर
कोई
कोशिश
ही
कर
के
देख
ले
Gulfam Ajmeri
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नज़र
से
उतर
जाते
हैं
लोग
हक़ीक़त
में
मर
जाते
हैं
लोग
उदासी
सनक
हिज्र
के
बाद
ख़ुदास
भी
डर
जाते
हैं
लोग
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Gulfam Ajmeri
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आँख
खुली
तो
सपना
भूल
गए
प्यास
बुझी
तो
दरिया
भूल
गए
सारा
कमरा
बिखेर
डाला
है
रख
कर
कहीं
पे
दुनिया
भूल
गए
कल
शब
हम
को
जो
याद
आया
था
हम
तो
उसको
कब
का
भूल
गए
हमको
रक़्स
सिखाने
आते
हैं
जो
ख़ुद
सीधा
चलना
भूल
गए
हम
से
न
पूछ
कुछ
भी
नामाबर
हम
ख़ुद
घर
का
रस्ता
भूल
गए
बातों
में
उलझाया
साक़ी
ने
कल
शब
हम
तो
पीना
भूल
गए
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Gulfam Ajmeri
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चश्म
उसकी
है
और
नज़ारा
भी
मौज
उसकी
है
और
किनारा
भी
लौट
कर
फिर
तू
ही
नहीं
आया
हम
ने
तुझ
को
बहुत
पुकारा
भी
बज़्म
से
उसकी
हम
को
जाना
था
और
फिर
मिल
गया
इशारा
भी
एक
ही
शख़्स
कैसे
मुमकिन
हैं
हो
तुम्हारा
भी
और
हमारा
भी
ज़ख़्म
भी
अब
तो
ताज़े
खा
'गुलफ़ाम'
इन
से
होता
नहीं
गुज़ारा
भी
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Gulfam Ajmeri
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