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Gulfam Ajmeri
chashm uski hai aur nazaara bhi
chashm uski hai aur nazaara bhi | चश्म उसकी है और नज़ारा भी
- Gulfam Ajmeri
चश्म
उसकी
है
और
नज़ारा
भी
मौज
उसकी
है
और
किनारा
भी
लौट
कर
फिर
तू
ही
नहीं
आया
हम
ने
तुझ
को
बहुत
पुकारा
भी
बज़्म
से
उसकी
हम
को
जाना
था
और
फिर
मिल
गया
इशारा
भी
एक
ही
शख़्स
कैसे
मुमकिन
हैं
हो
तुम्हारा
भी
और
हमारा
भी
ज़ख़्म
भी
अब
तो
ताज़े
खा
'गुलफ़ाम'
इन
से
होता
नहीं
गुज़ारा
भी
- Gulfam Ajmeri
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ये
लेगी
आजमाइश
ज़िंदगी
कब
तक
यक़ीं
करता
रहेगा
आदमी
कब
तक
कहा
ग़म
से
के
छुट्टी
चाहिए
मुझ
को
मुझे
फिर
पूछा
ग़म
ने
वापसी
कब
तक
इधर
जल्दी
थी
घर
वालों
को
शादी
की
बता
तेरा
पता
मैं
ढूँढती
कब
तक
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Gulfam Ajmeri
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अजब
अंदाज़
से
ये
घर
गिरा
है
मिरा
मलबा
मिरे
ऊपर
गिरा
है
Gulfam Ajmeri
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तुम
ख़ुदा
ख़ुद
को
अगर
जो
मानते
हो
हिज्र
में
मर
जाने
का
ग़म
जानते
हो
?
मैं
वहीं
हूँ
जो
तुम्हारे
साथ
रोया
तुम
तो
हम
को
अब
कहा
पहचानते
हो
जब
था
ज़िंदा
तो
नहीं
ली
आपने
सुद
बैठ
के
अब
कैसे
मिट्टी
छानते
हो
?
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Gulfam Ajmeri
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वैसे
इसका
तो
इरादा
भी
नहीं
जीने
का
अब
फिर
भी
चारा-गर
कोई
कोशिश
ही
कर
के
देख
ले
Gulfam Ajmeri
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किसी
का
अगर
दिल
दुखाए
हुए
हो
नज़र
का
भी
जादू
चलाए
हुए
हो
तुम्हारे
भी
चेहरे
से
मुझ
को
लगा
है
मुहब्बत
के
तुम
भी
सताए
हुए
हो
बता
जाने
का
दूसरा
कोई
क़िस्सा
कहानी
ये
तो
तुम
सुनाए
हुए
हो
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Gulfam Ajmeri
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