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Gulfam Ajmeri
ye legi aazmaaish zindagi kab tak
ye legi aazmaaish zindagi kab tak | ये लेगी आजमाइश ज़िंदगी कब तक
- Gulfam Ajmeri
ये
लेगी
आजमाइश
ज़िंदगी
कब
तक
यक़ीं
करता
रहेगा
आदमी
कब
तक
कहा
ग़म
से
के
छुट्टी
चाहिए
मुझ
को
मुझे
फिर
पूछा
ग़म
ने
वापसी
कब
तक
इधर
जल्दी
थी
घर
वालों
को
शादी
की
बता
तेरा
पता
मैं
ढूँढती
कब
तक
- Gulfam Ajmeri
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कोई
ख़ामोश
ज़ख़्म
लगती
है
ज़िन्दगी
एक
नज़्म
लगती
है
Gulzar
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बहुत
हसीन
सही
सोहबतें
गुलों
की
मगर
वो
ज़िंदगी
है
जो
काँटों
के
दरमियाँ
गुज़रे
Jigar Moradabadi
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है
सहज
स्वीकार
जो
जीवन
पे
वो
अपवाद
तुम
ज़िंदगी
अवसाद
है
अवसाद
में
उन्माद
तुम
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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तू
कहानी
ही
के
पर्दे
में
भली
लगती
है
ज़िन्दगी
तेरी
हक़ीक़त
नहीं
देखी
जाती
Akhtar Saeed Khan
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पहेली
ज़िंदगी
की
कब
तू
ऐ
नादान
समझेगा
बहुत
दुश्वारियाँ
होंगी
अगर
आसान
समझेगा
Zubair Ali Tabish
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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ज़िंदगी
भर
के
लिए
दिल
पे
निशानी
पड़
जाए
बात
ऐसी
न
लिखो,
लिख
के
मिटानी
पड़
जाए
Aadil Rasheed
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दूसरी
कोई
लड़की
ज़िंदगी
में
आएगी
कितनी
देर
लगती
है
उस
को
भूल
जाने
में
Bashir Badr
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ज़िंदगी
तुझ
से
भी
क्या
ख़ूब
त'अल्लुक़
है
मिरा
जैसे
सूखे
हुए
पत्ते
से
हवा
का
रिश्ता
Khalish Akbarabadi
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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देखूँ
जो
ख़ुद
को
दिखता
है
बस
उस
का
अक्स
सो
सारे
आईने
जला
के
बैठा
हूँ
उस
ने
कहा
था
लौट
कर
आऊँगा
मैं
जब
से
नज़र
दर
पे
लगा
के
बैठा
हूँ
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Gulfam Ajmeri
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अजब
अंदाज़
से
ये
घर
गिरा
है
मिरा
मलबा
मिरे
ऊपर
गिरा
है
Gulfam Ajmeri
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तुम
ख़ुदा
ख़ुद
को
अगर
जो
मानते
हो
हिज्र
में
मर
जाने
का
ग़म
जानते
हो
?
मैं
वहीं
हूँ
जो
तुम्हारे
साथ
रोया
तुम
तो
हम
को
अब
कहा
पहचानते
हो
जब
था
ज़िंदा
तो
नहीं
ली
आपने
सुद
बैठ
के
अब
कैसे
मिट्टी
छानते
हो
?
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Gulfam Ajmeri
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सब
पूछते
हैं
इस
उदासी
का
सबब
रो
देते
हैं
लेकिन
उगलते
कुछ
नहीं
Gulfam Ajmeri
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मिरा
तो
शा'इरी
से
बस
गुज़ारा
चल
रहा
है
तिरा
ज़ख़्मों
का
कारोबार
अच्छा
चल
रहा
है
तिरा
तो
हिज्र
भी
पुर-लुत्फ़
सा
लगता
है
मुझ
को
मुसलसल
अब
यही
चलने
दे
जैसा
चल
रहा
है
मैं
मंज़िल
पर
नहीं
पहुँचा
अभी
तक
ना-ख़ुदा
क्यूँ
ये
कश्ती
रुक
गई
है
या
किनारा
चल
रहा
है
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Gulfam Ajmeri
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