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Dhiraj Singh 'Tahammul'
hai sahaj sveekaar jo jeevan pe vo apvaad tum
hai sahaj sveekaar jo jeevan pe vo apvaad tum | है सहज स्वीकार जो जीवन पे वो अपवाद तुम
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
है
सहज
स्वीकार
जो
जीवन
पे
वो
अपवाद
तुम
ज़िंदगी
अवसाद
है
अवसाद
में
उन्माद
तुम
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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तुम्हारी
मौत
मेरी
ज़िंदगी
से
बेहतर
है
तुम
एक
बार
मरे
मैं
तो
बार
बार
मरा
Zubair Ali Tabish
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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ज़ख़्म
जो
तुम
ने
दिया
वो
इस
लिए
रक्खा
हरा
ज़िंदगी
में
क्या
बचेगा
ज़ख़्म
भर
जाने
के
बाद
Azm Shakri
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गँवाई
किस
की
तमन्ना
में
ज़िंदगी
मैं
ने
वो
कौन
है
जिसे
देखा
नहीं
कभी
मैं
ने
Jaun Elia
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कुछ
दिन
से
ज़िंदगी
मुझे
पहचानती
नहीं
यूँँ
देखती
है
जैसे
मुझे
जानती
नहीं
Anjum Rehbar
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ज़िंदगी
ज़िंदा-दिली
का
है
नाम
मुर्दा-दिल
ख़ाक
जिया
करते
हैं
Imam Bakhsh Nasikh
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अब
ज़िन्दगी
से
कोई
मिरा
वास्ता
नहीं
पर
ख़ुद-कुशी
भी
कोई
सही
रास्ता
नहीं
Rahul
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तल्ख़ियाँ
इस
में
बहुत
कुछ
हैं
मज़ा
कुछ
भी
नहीं
ज़िंदगी
दर्द-ए-मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
भी
नहीं
Kaleem Aajiz
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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साथ
दिया
है
किसने
किसका
किसकी
सोहबत
कौन
चलेगा
मेरी
ज़िल्लत
मेरी
ख़िफ़्फ़त
लेकर
तोहमत
कौन
चलेगा
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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मयख़ाना
बनवाया
है
पे
रख
दी
है
तस्वीर
तुम्हारी
मय
की
पूछे
क्या
कोई
मदहोशी
है
तस्वीर
तुम्हारी
दहशत
में
रहता
है
दिल
ये
हर
पल
बस
अंजाम
से
अपने
क्या
होगा
जो
जाने
सब
याँ
रक्खी
है
तस्वीर
तुम्हारी
क्या
सूरत
हम
लिए
मुख़ातिब
होंगे
रोज़–ए–हश्र
ख़ुदास
सज्दे
में
होता
हूँ
जब
भी
दिखती
है
तस्वीर
तुम्हारी
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ख़ुदाया
ज़िंदगी
में
काश
ये
वक़्फ़ा
नहीं
होता
यहाँ
पेशानियों
का
बोझ
तक
हल्का
नहीं
होता
गुज़र
जाते
ये
दिन
हैं
वाक़िआत-ए-रोज़-मर्रा
में
मगर
ये
रात
का
साया
कभी
धुँदला
नहीं
होता
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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शाम
को
दीदार
अपना
आइने
में
हो
गया
फ़ाश
सब
किरदार
अपना
आइने
में
हो
गया
बरगुज़ीदा
एक
सूरत
क़ैद
आँखों
में
हुई
और
बस
घर-बार
अपना
आइने
में
हो
गया
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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वस्ल
की
शब
इंतज़ारी
में
मरे
कोई
यहाँ
आरज़ू–ए–इश्क़
में
क्या–क्या
करे
कोई
यहाँ
बात
कोई
हो
लबों
पे
बात
उनकी
आ
गई
और
क्या
हो
आँख
को
ख़ूँ–ख़ूँ
भरे
कोई
यहाँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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