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Gulfam Ajmeri
nazar se utar jaate hain log
nazar se utar jaate hain log | नज़र से उतर जाते हैं लोग
- Gulfam Ajmeri
नज़र
से
उतर
जाते
हैं
लोग
हक़ीक़त
में
मर
जाते
हैं
लोग
उदासी
सनक
हिज्र
के
बाद
ख़ुदास
भी
डर
जाते
हैं
लोग
- Gulfam Ajmeri
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अज़ल
से
ले
कर
के
आज
तक
मैं
कभी
भी
तन्हा
नहीं
रहा
हूँ
कभी
थे
तुम
तो,
कभी
थी
दुनिया,
कभी
ये
ग़ज़लें,
कभी
उदासी
Ankit Maurya
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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उदासी
जैसे
कि
उसके
बदन
का
हिस्सा
है
अधूरा
लगता
है
वो
शख़्स
अगर
उदास
न
हो
Vikram Sharma
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सभी
के
साथ
दिखना
भी
मगर
सब
सेे
जुदा
रहना
भी
है
उसको
उदासी
साथ
भी
रखनी
है
और
तस्वीर
में
हँसना
भी
है
उसको
Kafeel Rana
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तो
देख
लेना
हमारे
बच्चों
के
बाल
जल्दी
सफ़ेद
होंगे
हमारी
छोड़ी
हुई
उदासी
से
सात
नस्लें
उदास
होंगी
Danish Naqvi
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हम
पे
एहसान
हैं
उदासी
के
मुस्कुराएँ
तो
शर्म
आती
है
Varun Anand
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उदासी
का
सबब
उस
सेे
जो
हम
तब
पूछ
लेते
वजह
फिर
पूछनी
पड़ती
न
शायद
ख़ुद-कुशी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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कहा
जो
कृष्ण
ने
गीता
में
रक्खेगा
अगर
तू
याद
भले
जितना
घना
जंगल
हो
पर
तू
खो
नहीं
सकता
Amaan Pathan
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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ज़िंदगी
भर
वो
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
एक
तस्वीर
जो
हँसते
हुए
खिंचवाई
थी
Yasir Khan
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मुझ
से
पहली
मर्तबा
तू
जब
मिला
था
बज़्म
में
उस
वक़्त
तू
सब
से
जुदा
था
हिज्र
में
रोया
नहीं
फिर
मेरा
दिल
भी
इस
को
तो
तेरे
बिछड़ने
का
पता
था
क़ैस
भी
मारा
गया
राँझा
भी
वरना
चाहे
जो
कर
सकता
था
तू
तो
ख़ुदा
था
ख़ुद-कुशी
करता
नहीं
मैं
पर
मिरे
साथ
ज़िंदगी
तुझ
को
पता
है
क्या
हुआ
था
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Gulfam Ajmeri
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तेरे
बाद
क्या
ये
ख़ाक
ज़िन्दगी
रही
और
मिरा
पता
उदासी
पूछती
रही
मेरे
यार
मुझ
को
हिज्र
खा
गया
तिरा
और
मेरी
माँ
नज़र
उतारती
रही
तुम
तो
उठ
के
चल
दिए
मिरे
क़रीब
से
मेरी
ख़ामुशी
तुम्हें
पुकारती
रही
मेरे
सारे
ख़्वाब
जल
के
राख
हो
गए
और
इधर
हवा
चराग़
ढूँढती
रही
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Gulfam Ajmeri
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ये
लेगी
आजमाइश
ज़िंदगी
कब
तक
यक़ीं
करता
रहेगा
आदमी
कब
तक
कहा
ग़म
से
के
छुट्टी
चाहिए
मुझ
को
मुझे
फिर
पूछा
ग़म
ने
वापसी
कब
तक
इधर
जल्दी
थी
घर
वालों
को
शादी
की
बता
तेरा
पता
मैं
ढूँढती
कब
तक
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Gulfam Ajmeri
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जितना
उदास
रहता
हूँ
अच्छा
उदास
रहता
हूँ
वो
देख
कर
चली
गई
कितना
उदास
रहता
हूँ
जो
देखे
देखता
रहे
इतना
उदास
रहता
हूँ
क़ासिद
वो
पूछ
लें
अगर
कहना
उदास
रहता
हूँ
मुश्किल
से
हँसता
हूँ
कभी
वरना
उदास
रहता
हूँ
बढ़ती
रही
तिरी
तलब
जितना
उदास
रहता
हूँ
मजनूँ
भी
शर्मा
जाएगा
ऐसा
उदास
रहता
हूँ
यारों
में
हँसता
हूँ
मैं
भी
तन्हा
उदास
रहता
हूँ
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Gulfam Ajmeri
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बस
वो
दीया
जलाने
को
सोचें
और
जंगल
में
आग
लग
जाए
Gulfam Ajmeri
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