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Gulfam Ajmeri
bas vo diiyaa jalane ko sochen
bas vo diiyaa jalane ko sochen | बस वो दीया जलाने को सोचें
- Gulfam Ajmeri
बस
वो
दीया
जलाने
को
सोचें
और
जंगल
में
आग
लग
जाए
- Gulfam Ajmeri
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जल्वा-ए-नूर
है
ये
दोनो
आँखें
उसकी
उसको
जलता
सा
शोला
जो
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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अपने
बदन
की
तुम
भी
हिफ़ाज़त
न
कर
सके
हम
ने
भी
ख़ूब
ग़ैर
के
चूल्हे
से
आग
ली
Harsh saxena
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तेरी
आँखों
में
जो
इक
क़तरा
छुपा
है,
मैं
हूँ
जिसने
छुप
छुप
के
तेरा
दर्द
सहा
है,
मैं
हूँ
एक
पत्थर
कि
जिसे
आँच
न
आई,
तू
है
एक
आईना
कि
जो
टूट
चुका
है,
मैं
हूँ
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Fauziya Rabab
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जो
यहाँ
ख़ुद
ही
लगा
रक्खी
है
चारों
जानिब
एक
दिन
हम
ने
इसी
आग
में
जल
जाना
है
Zafar Iqbal
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मैं
इक
चिंगारी
हूँ
तू
मुझको
इतना
भी
न
छेड़ा
कर
जो
शोला
बन
गया
गर
तो
ज़माना
राख
कर
दूँगा
Harsh saxena
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ये
सच
है
नफ़रतों
की
आग
ने
सब
कुछ
जला
डाला
मगर
उम्मीद
की
ठण्डी
हवाएँ
रोज़
आती
हैं
Munawwar Rana
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मैं
आ
रहा
हूँ
अभी
चूम
कर
बदन
उस
का
सुना
था
आग
पे
बोसा
रक़म
नहीं
होता
Shanawar Ishaq
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मैं
ने
हाथों
से
बुझाई
है
दहकती
हुई
आग
अपने
बच्चे
के
खिलौने
को
बचाने
के
लिए
Shakeel Jamali
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गुदाज़-ए-इश्क़
नहीं
कम
जो
मैं
जवाँ
न
रहा
वही
है
आग
मगर
आग
में
धुआँ
न
रहा
Jigar Moradabadi
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मैं
क्या
करूँँ
मेरी
बेगम
सुहाग
ढूँढे
है
मेरे
बुझे
हुए
चूल्हे
में
आग
ढूँढ़े
है
वो
दिन
गए
कि
उड़ाते
थे
फ़ाख़्ताएँ
हम
सपेरा
चूहे
के
इक
बिल
में
नाग
ढूँढे
है
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Paplu Lucknawi
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ग़ैर
के
साथ
वो
नज़र
आया
अश्क
आँखों
से
फिर
उतर
आया
साक़ी
मुझ
को
शराब
मत
देना
आज
जी
पी
के
मेरा
भर
आया
थक
गई
आँखें
रास्ता
तकते
लौट
के
वो
न
उम्र
भर
आया
पी
थी
जिसको
भुलाने
की
ख़ातिर
याद
वो
मुझ
को
रात
भर
आया
बाद
तेरे
न
कुछ
सुना
मैंने
बाद
तेरे
न
कुछ
नज़र
आया
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Gulfam Ajmeri
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ज़ख़्म
गहरा
नहीं
के
तुम
से
कहें
दिल
भी
करता
नहीं
के
तुम
से
कहें
दर्द
को
ज़ब्त
कर
के
बैठ
गए
हम
से
होता
नहीं
के
तुम
से
कहें
हम
ने
तो
पूछना
नहीं
जो
सुना
तुम
ने
कहना
नहीं
के
तुम
से
कहें
आँख
से
आँसू
ही
तो
निकला
है
कोई
दरिया
नहीं
के
तुम
से
कहें
वैसे
दिल
करता
है
के
तुम
से
कहूँ
मेरा
बनता
नहीं
के
तुम
से
कहें
मुक़्तसर
वक़्त
ले
के
आए
हो
वरना
क्या
क्या
नहीं
के
तुम
से
कहें
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Gulfam Ajmeri
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रात
वो
मेरे
घर
थे
आए
हुए
सारे
गर्द
ओ
ग़ुबार
छटते
हुए
कैसे
रौशन
करे
हँसी
कोई
जो
मुहब्बत
के
हो
सताए
हुए
रात
हम
करवटें
बदलते
रहे
ख़्वाब
आए
तिरे
दिखाए
हुए
याद
करते
तो
याद
आते
नहीं
भूलते
भी
नहीं
भुलाए
हुए
ये
अदाकारी
कुछ
न
आई
काम
रो
दिए
हम
तो
मुस्कुराते
हुए
मुझ
को
होता
नहीं
यक़ीं
क़ासिद
रो
पड़े
मुझ
को
याद
करते
हुए
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अगर
दिल
जो
किसी
का
ताज़ा
टूटे
कोई
आवाज़
दे
तो
सपना
टूटे
बनाए
रखना
दूरी
बज़्म
में
आप
न
जाने
ज़ेहन
का
कब
शीशा
टूटे
नहीं
भर
सकता
फिर
वो
ज़ख़्म
कोई
अगर
जो
वक़्त
पहले
टाँका
टूटे
कोई
कैसे
मिरे
दुख
जान
पाए
?
कोई
तो
हो
जो
मेरे
जैसा
टूटे
मुहब्बत
अब
नहीं
करनी
हमें
यार
कोई
टूटे
भी
तो
फिर
कितना
टूटे
मिरी
माँ
का
तू
भी
तो
दर्द
समझे
मोहब्बत
में
तिरा
भी
लड़का
टूटे
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यूँँ
तो
तिरे
इस
शहर
में
बीमार
बहुत
है
मरने
के
लिए
तो
तेरा
इनकार
बहुत
है
जो
शहर
बसाने
को
मुहब्बत
लगी
होगी
वो
शहर
जलाने
को
तो
अख़बार
बहुत
है
बोसे
वो
तो
देती
रही
कुछ
हम
भी
न
बोले
हमको
तो
मिरी
जान
ये
दरकार
बहुत
है
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