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Gulfam Ajmeri
zaKHm gahra nahin ke tum se kahein
zaKHm gahra nahin ke tum se kahein | ज़ख़्म गहरा नहीं के तुम से कहें
- Gulfam Ajmeri
ज़ख़्म
गहरा
नहीं
के
तुम
से
कहें
दिल
भी
करता
नहीं
के
तुम
से
कहें
दर्द
को
ज़ब्त
कर
के
बैठ
गए
हम
से
होता
नहीं
के
तुम
से
कहें
हम
ने
तो
पूछना
नहीं
जो
सुना
तुम
ने
कहना
नहीं
के
तुम
से
कहें
आँख
से
आँसू
ही
तो
निकला
है
कोई
दरिया
नहीं
के
तुम
से
कहें
वैसे
दिल
करता
है
के
तुम
से
कहूँ
मेरा
बनता
नहीं
के
तुम
से
कहें
मुक़्तसर
वक़्त
ले
के
आए
हो
वरना
क्या
क्या
नहीं
के
तुम
से
कहें
- Gulfam Ajmeri
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वो
घुट
के
रह
गई
घूँघट
की
आड़
में
वो
कह
न
पाई
कि
लड़का
नहीं
पसंद
Gulfam Ajmeri
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अपना
हर
ज़ख़्म
हम
ने
हरा
कर
दिया
जो
मुहब्बत
में
हम
से
हुआ
कर
दिया
देख
चेहरे
पे
मुस्कान
हैरत
न
कर
क़ैदस
किस
ने
मुजरिम
रिहा
कर
दिया
आते
हो
फिर
भी
"गुलफ़ाम"
को
ढूँढने
आप
को
इक
दफ़ा
जब
मना
कर
दिया
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तेरे
बाद
क्या
ये
ख़ाक
ज़िन्दगी
रही
और
मिरा
पता
उदासी
पूछती
रही
मेरे
यार
मुझ
को
हिज्र
खा
गया
तिरा
और
मेरी
माँ
नज़र
उतारती
रही
तुम
तो
उठ
के
चल
दिए
मिरे
क़रीब
से
मेरी
ख़ामुशी
तुम्हें
पुकारती
रही
मेरे
सारे
ख़्वाब
जल
के
राख
हो
गए
और
इधर
हवा
चराग़
ढूँढती
रही
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वैसे
इसका
तो
इरादा
भी
नहीं
जीने
का
अब
फिर
भी
चारा-गर
कोई
कोशिश
ही
कर
के
देख
ले
Gulfam Ajmeri
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मुहब्बत
आठवीं
कर
तो
लें
हम
भी
पर
ज़रा
सातों
का
दुख
भी
कम
हुआ
होता
नहीं
की
ख़ुद-कुशी
यह
सोच
कर
मैंने
फ़क़त
अब
मौत
से
भी
मेरा
क्या
होता
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