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Gulfam Ajmeri
vo ghut ke rah gaii ghoonghat kii aad men
vo ghut ke rah gaii ghoonghat kii aad men | वो घुट के रह गई घूँघट की आड़ में
- Gulfam Ajmeri
वो
घुट
के
रह
गई
घूँघट
की
आड़
में
वो
कह
न
पाई
कि
लड़का
नहीं
पसंद
- Gulfam Ajmeri
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कोई
सहरा
कोई
जंगल
कोई
दरिया
पड़ता
ढूँढते
तुझ
को
तिरी
खोज
में
चलना
पड़ता
काश
इक
रोज़
तू
जो
घर
को
बुलाती
अपने
काश
उस
रोज़
हमें
फिर
कहीं
छिपना
पड़ता
हिज्र
आसान
नहीं
है
मिरी
जाँ
हम
से
पूछ
दूसरा
गर
कोई
होता
उसे
मरना
पड़ता
जल्दबाज़ी
में
ख़रीदा
है
ये
जो
दिल
'गुलफ़ाम'
और
बाज़ार
में
टकराते
तो
सस्ता
पड़ता
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तुम
ख़ुदा
ख़ुद
को
अगर
जो
मानते
हो
हिज्र
में
मर
जाने
का
ग़म
जानते
हो
?
मैं
वहीं
हूँ
जो
तुम्हारे
साथ
रोया
तुम
तो
हम
को
अब
कहा
पहचानते
हो
जब
था
ज़िंदा
तो
नहीं
ली
आपने
सुद
बैठ
के
अब
कैसे
मिट्टी
छानते
हो
?
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आँधी
चलती
है
रात-भर
मुझ
में
टूट
कर
गिर
गए
शजर
मुझ
में
ज़ख़्म
ले
के
मैं
अब
कहाँ
जाऊँ
शे'र
कहता
है
चारा-गर
मुझ
में
कौन
था
जिस
से
ये
मुहब्बत
थी
कौन
फिर
कर
गया
असर
मुझ
में
रहगुज़र
किस
तरफ़
मुझे
लाया
रो
पड़ा
मेरा
हम-सफ़र
मुझ
में
आतिश-ए-दिल
है
दरमियाँ
ऐसी
जल
रहा
हो
किसी
का
घर
मुझ
में
क़ैद-ख़ाने
में
ख़ुश
थे
जो
पंछी
उड़ते
हैं
अब
इधर
उधर
मुझ
में
कोहकन
तोड़ता
है
जाने
क्या
क्या
बनाता
है
कूज़ा-गर
मुझ
में
तू
ही
इक
दिन
उजाड़
दे
मुझ
को
एक
दिन
तू
ही
बन-सँवर
मुझ
में
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यार
तुम
भी
कमाल
करते
हो
इश्क़
कर
के
ये
हाल
करते
हो
अपने
ही
हाथों
हम
हुए
बर्बाद
आप
फिर
क्यूँँ
मलाल
करते
हो
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हमें
तो
ज़िंदगी
से
भी
निभाना
था
जो
अब
तक
याद
है
उस
को
भुलाना
था
तू
ने
बस
पैरहन
ही
बदला
है
सय्याद
परिंदों
से
क़फ़स
भी
तो
छुपाना
था
घुमाता
ही
रहेगा
चाक
पर
मुझ
को
मिरा
अब
कुछ
तो
कूज़ागर
बनाना
था
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