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Gulfam Ajmeri
ha
ha | हमें तो ज़िंदगी से भी निभाना था
- Gulfam Ajmeri
हमें
तो
ज़िंदगी
से
भी
निभाना
था
जो
अब
तक
याद
है
उस
को
भुलाना
था
तू
ने
बस
पैरहन
ही
बदला
है
सय्याद
परिंदों
से
क़फ़स
भी
तो
छुपाना
था
घुमाता
ही
रहेगा
चाक
पर
मुझ
को
मिरा
अब
कुछ
तो
कूज़ागर
बनाना
था
- Gulfam Ajmeri
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वो
किसी
को
याद
कर
के
मुस्कुराया
था
उधर
और
मैं
नादान
ये
समझा
कि
वो
मेरा
हुआ
Iqbal Ashhar
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मरने
का
है
ख़याल
ना
जीने
की
आरज़ू
बस
है
मुझे
तो
वस्ल
के
मौसम
की
जुस्तजू
Muzammil Raza
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कर
रहा
था
ग़म-ए-जहाँ
का
हिसाब
आज
तुम
याद
बे-हिसाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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फूल
ही
फूल
याद
आते
हैं
आप
जब
जब
भी
मुस्कुराते
हैं
Sajid Premi
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भुला
दिया
है
जो
तू
ने
तो
कुछ
मलाल
नहीं
कई
दिनों
से
मुझे
भी
तिरा
ख़याल
नहीं
Navin C. Chaturvedi
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अब
उस
के
दर
से
भी
आवाज़
आती
है
कि
नहीं
बता
रे
ज़िन्दगी
तू
बाज़
आती
है
कि
नहीं
बहकने
लगता
है
जब
जब
किसी
के
प्यार
में
दिल
तो
तेरी
याद
यूँंँ
आके
डराती
है
कि
नहीं
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Faiz Ahmad
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जाते
जाते
आप
इतना
काम
तो
कीजे
मिरा
याद
का
सारा
सर-ओ-सामाँ
जलाते
जाइए
Jaun Elia
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तेरा
बनता
था
कि
तू
दुश्मन
हो
अपने
हाथों
से
खिलाया
था
तुझे
तेरी
गाली
से
मुझे
याद
आया
कितने
तानों
से
बचाया
था
तुझे
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Ali Zaryoun
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इश्क़
पहले
पहले
तो
अच्छा
लगेगा
अजनबी
भी
तुझ
को
फिर
तेरा
लगेगा
जिस
अदास
हम
ने
तुम
से
ज़ख़्म
खाए
कैसे
मरहम
कैसे
अब
टाँका
लगेगा
हम
को
जाना
है
इसी
दरिया
के
उस
पार
सुनने
में
आया
यहाँ
पहरा
लगेगा
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Gulfam Ajmeri
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मुझ
से
पहली
मर्तबा
तू
जब
मिला
था
बज़्म
में
उस
वक़्त
तू
सब
से
जुदा
था
हिज्र
में
रोया
नहीं
फिर
मेरा
दिल
भी
इस
को
तो
तेरे
बिछड़ने
का
पता
था
क़ैस
भी
मारा
गया
राँझा
भी
वरना
चाहे
जो
कर
सकता
था
तू
तो
ख़ुदा
था
ख़ुद-कुशी
करता
नहीं
मैं
पर
मिरे
साथ
ज़िंदगी
तुझ
को
पता
है
क्या
हुआ
था
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Gulfam Ajmeri
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बस
रह
न
पाए
हम
हमारे
ही
मगर
इस
खेल
में
वैसे
तो
हारे
कुछ
नहीं
पागल
हो
जाए
देख
ले
बस
इक
नज़र
फिर
तो
तुम्हारे
जादू
टोने
कुछ
नहीं
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Gulfam Ajmeri
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किसी
का
अगर
दिल
दुखाए
हुए
हो
नज़र
का
भी
जादू
चलाए
हुए
हो
तुम्हारे
भी
चेहरे
से
मुझ
को
लगा
है
मुहब्बत
के
तुम
भी
सताए
हुए
हो
बता
जाने
का
दूसरा
कोई
क़िस्सा
कहानी
ये
तो
तुम
सुनाए
हुए
हो
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Gulfam Ajmeri
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मुहब्बत
आठवीं
कर
तो
लें
हम
भी
पर
ज़रा
सातों
का
दुख
भी
कम
हुआ
होता
नहीं
की
ख़ुद-कुशी
यह
सोच
कर
मैंने
फ़क़त
अब
मौत
से
भी
मेरा
क्या
होता
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Gulfam Ajmeri
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