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Siddharth Saaz
aur hua bhi theek vo hi jiska dar tha
aur hua bhi theek vo hi jiska dar tha | और हुआ भी ठीक वो ही जिसका डर था
- Siddharth Saaz
और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
- Siddharth Saaz
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अक्स-दर-अक्स
बिखरना
है
मुझे
जाने
क्या
टूट
गया
है
मुझ
में
Khalid Moin
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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हर
इक
सू
हैं
दर-ओ-दीवार
लेकिन
मुयस्सर
है
नहीं
घर-बार
लेकिन
Umrez Ali Haider
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उसे
ज़ियादा
ज़रूरत
थी
घर
बसाने
की
वो
आ
के
मेरे
दर-ओ-बाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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अगर
साए
से
जल
जाने
का
इतना
ख़ौफ़
था
तो
फिर
सहर
होते
ही
सूरज
की
निगहबानी
में
आ
जाते
Azm Shakri
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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ख़ुदा,
फ़रिश्ते,
पयम्बर,
बशर
किसी
का
नहीं
मुझे
लिहाज़
तो
सबका
है
डर
किसी
का
नहीं
Charagh Sharma
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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तमाम
दुनिया
में
तीरगी
है
मगर
इक
अंदर
की
रौशनी
है
कभी
तो
लगता
है
ख़त्म
कर
दूँ
प
जब
तू
हँस
के
पुकारती
है
तेरा
मोहब्बत
से
हार
जाना
मेरी
मोहब्बत
की
हार
भी
है
तिरे
बिना
ज़िंदगी
ये
हमको
कि
जैसे
खाने
को
दौड़ती
है
तेरे
दीवाने
का
हारना
भी
तेरे
दीवाने
की
जीत
ही
है
मैं
तेरा
होकर
भी
तन्हा
तन्हा
भटक
रहा
हूँ
ये
बेघरी
है
तू
जिसपे
चढ़
के
उतर
गई
थी
वो
दिल
की
कश्ती
वहीं
खड़ी
है
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Siddharth Saaz
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यहाँ
पे
कल
की
रात
सर्द
थी
हर
एक
रोज़
से
सो
रात
भर
बुझा
नहीं
तुम्हारी
याद
का
अलाव
Siddharth Saaz
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ये
ख़ुश
आँखें
किसी
दिन
रो
पड़ेंगी
और
किसी
दिन
मुस्कुराएंगी
उदास
आँखें
Siddharth Saaz
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जब
से
तूने
ये
बोला
था
"बदन
का
क्या
है
मिट्टी
है"
तब
से
तेरी
पीठ
पे
मुझको
हरसिंगार
उगाने
थे
Siddharth Saaz
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एक
नया
'आशिक़
है
उसका,
जान
छिड़कता
है
उसपर
मुझको
डर
है
वो
भी
इक
दिन
मय-ख़ाने
से
निकलेगा
Siddharth Saaz
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