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Ankit gupta
main kisi ka kya bhala ho paaooñga
main kisi ka kya bhala ho paaooñga | मैं किसी का क्या भला हो पाऊँगा
- Ankit gupta
मैं
किसी
का
क्या
भला
हो
पाऊँगा
याद
है
तुमको,
तुम्हारा
था
कभी
- Ankit gupta
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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बिछड़
गया
हूँ
मगर
याद
करता
रहता
हूँ
किताब
छोड़
चुका
हूँ
पढ़ाई
जारी
है
Ali Zaryoun
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कभी
तो
कोसते
होंगे
सफ़र
को
कभी
जब
याद
करते
होंगे
घर
को
निकल
पड़ती
हैं
औलादें
कमाने
परिंदे
खोल
ही
लेते
हैं
पर
को
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Siddharth Saaz
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है
दु'आ
याद
मगर
हर्फ़-ए-दुआ
याद
नहीं
मेरे
नग़्मात
को
अंदाज़-ए-नवा
याद
नहीं
Saghar Siddiqui
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मैं
इस
ख़याल
से
शर्मिंदगी
में
डूब
गया
कि
मेरे
होते
हुए
वो
नदी
में
डूब
गया
Siraj Faisal Khan
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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वो
किसी
को
याद
कर
के
मुस्कुराया
था
उधर
और
मैं
नादान
ये
समझा
कि
वो
मेरा
हुआ
Iqbal Ashhar
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तुम्हारी
याद
का
रंग
डाल
कर
के
कहा
तन्हाई
ने
होली
मुबारक
!
Bhaskar Shukla
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कुछ
इस
तरह
से
याद
आते
रहे
हो
कि
अब
भूल
जाने
को
जी
चाहता
है
Akhtar Shirani
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भूलना
चाहा
अगर
उस
को
कभी
और
भी
वो
याद
आया
देर
तक
Nawaz Deobandi
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न
तोड़ो
फूल
ये
सूना
लगेगा
गुलिस्ताँ
की
इसी
से
रौनक़ें
हैं
Ankit gupta
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कुछ
याद
आ
गए
हैं
वो
मौसम
बहार
के
ऐसे
भले
सुख़न
है
कहें
उसने
प्यार
के
मदहोश
क्यूँ
हुए
हैं
ये
हम
सेे
तो
पूछिए
ज़ुल्फ़ें
झटक
के
वो
है
गए
मुँह
पे
मार
के
जज़्बात
थे
मेरे
वो
अँगूठी
महज़
न
थी
तुमने
जो
फेंक
दी
है
अँगूठी
उतार
के
मुझ
जैसे
बिगड़े
शख़्स
को
अच्छा
बना
दिया
लेकिन
बिछड़
गया
है
वो
हमको
सुधार
के
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Ankit gupta
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लगता
है
जैसे
हिज्र
में
कुछ
भी
बचा
नहीं
मेरा
ख़ुदा
भी
इन
दिनों
मेरा
ख़ुदा
नहीं
मैं
ख़ुश
बहुत
था
उस
घड़ी
तेरे
विसाल
में
जब
हिज्र
से
हुआ
था
मेरा
सामना
नहीं
ख़ुदगर्ज़
कैसे
इश्क़
में
हो
जाऊँ
मैं
तेरे
घर
से
शरीफ़
लड़का
कभी
भागता
नहीं
कितना
मैं
रो
रहा
हूँ
मगर
जानता
हूँ
ये
जो
जा
चुका
है
रोने
से
वो
लौटता
नहीं
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Ankit gupta
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तुम्हारे
साथ
तो
अब
क़ाफ़िले
हैं
मगर
हम
आज
भी
तन्हा
खड़े
हैं
कभी
बाद-ए-सबास
पूछना
ये
तेरी
यादों
में
कितना
जागते
हैं
तुम्हारा
"आप"
कहना
खल
रहा
है
हमारे
बीच
कितने
फ़ासले
हैं?
कहीं
भी
दिल
नहीं
लगता
हमारा
तेरे
बारे
में
इतना
सोचते
हैं
तवक़्क़ो
ग़ैर
से
क्या?
जब
दुखों
में
हमारे
अपने
जुमले
कस
रहे
हैं
बचो
शीरीं
ज़बाँ
वालों
से
यारों
फँसाने
के
सभी
ये
चोचले
हैं
वहाँ
अब
जा
रहा
हूँ
यार
अंकित
जहाँ
कुछ
लोग
मुझको
जानते
हैं
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Ankit gupta
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साल
ये
भी
चला
गया
आख़िर
ये
बता
क्या
नया
हुआ
आख़िर
हमने
तक़दीर
को
ही
समझा
सब
और
सबकुछ
हुआ
बुरा
आख़िर
चार
दिन
में
बिछड़
गए
हम
तुम
जिसका
डर
था
वही
हुआ
आख़िर
वस्ल
की
रात
साथ
में
हमने
हिज्र
का
ज़हर
भी
पिया
आख़िर
पहले
तो
साथ
चलते
थे
दोनों
उसने
रस्ता
बदल
लिया
आख़िर
हमने
हरदम
उसे
मुहब्बत
दी
उसने
फिर
ग़म
दिया
नया
आख़िर
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Ankit gupta
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