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Ankit gupta
lagta hai jaise hijr men kuchh bhi bacha nahin
lagta hai jaise hijr men kuchh bhi bacha nahin | लगता है जैसे हिज्र में कुछ भी बचा नहीं
- Ankit gupta
लगता
है
जैसे
हिज्र
में
कुछ
भी
बचा
नहीं
मेरा
ख़ुदा
भी
इन
दिनों
मेरा
ख़ुदा
नहीं
मैं
ख़ुश
बहुत
था
उस
घड़ी
तेरे
विसाल
में
जब
हिज्र
से
हुआ
था
मेरा
सामना
नहीं
ख़ुदगर्ज़
कैसे
इश्क़
में
हो
जाऊँ
मैं
तेरे
घर
से
शरीफ़
लड़का
कभी
भागता
नहीं
कितना
मैं
रो
रहा
हूँ
मगर
जानता
हूँ
ये
जो
जा
चुका
है
रोने
से
वो
लौटता
नहीं
- Ankit gupta
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हिज्र
की
रातें
इतनी
भारी
होती
हैं
जैसे
छाती
पर
ऐरावत
बैठा
हो
Tanoj Dadhich
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ख़ुदा
करे
कि
तिरी
उम्र
में
गिने
जाएँ
वो
दिन
जो
हम
ने
तिरे
हिज्र
में
गुज़ारे
थे
Ahmad Nadeem Qasmi
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बिछड़
जाएँगे
हम
दोनों
ज़मीं
पर
ये
उस
ने
आसमाँ
पर
लिख
दिया
है
Siraj Faisal Khan
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इस
से
पहले
कि
ज़मीं-ज़ाद
शरारत
कर
जाएँ
हम
सितारों
ने
ये
सोचा
है
कि
हिजरत
कर
जाएँ
दौलत-ए-ख़्वाब
हमारे
जो
किसी
काम
न
आई
अब
किसी
को
नहीं
मिलने
की
वसिय्यत
कर
जाएँ
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Idris Babar
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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अब
तो
मैं
बाल
बढ़ा
सकता
हूँ
हिज्र
में
कितनी
सहूलत
है
मुझे
Nasir khan 'Nasir'
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उभर
कर
हिज्र
के
ग़म
से
चुनी
है
ज़िंदगी
हमने
वगरना
हम
जहाँ
पर
थे
वहाँ
पर
ख़ुद-कुशी
भी
थी
Naved sahil
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हिज्र
में
इश्क़
यूँँ
रखा
आबाद
हिचकियांँ
तन्हा
तन्हा
लेते
रहे
Siraj Tonki
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ख़ौफ़
आता
है
अपने
साए
से
हिज्र
के
किस
मक़ाम
पर
हूँ
मैं
Siraj Faisal Khan
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ये
जो
हिजरत
के
मारे
हुए
हैं
यहाँ
अगले
मिसरे
पे
रो
के
कहेंगे
कि
हाँ
Ali Zaryoun
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तुम्हारे
साथ
तो
अब
क़ाफ़िले
हैं
मगर
हम
आज
भी
तन्हा
खड़े
हैं
कभी
बाद-ए-सबास
पूछना
ये
तेरी
यादों
में
कितना
जागते
हैं
तुम्हारा
"आप"
कहना
खल
रहा
है
हमारे
बीच
कितने
फ़ासले
हैं?
कहीं
भी
दिल
नहीं
लगता
हमारा
तेरे
बारे
में
इतना
सोचते
हैं
तवक़्क़ो
ग़ैर
से
क्या?
जब
दुखों
में
हमारे
अपने
जुमले
कस
रहे
हैं
बचो
शीरीं
ज़बाँ
वालों
से
यारों
फँसाने
के
सभी
ये
चोचले
हैं
वहाँ
अब
जा
रहा
हूँ
यार
अंकित
जहाँ
कुछ
लोग
मुझको
जानते
हैं
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Ankit gupta
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सारे
जहाँ
में
हिज्र
का
मातम
बहुत
है
दोस्त
ऐसा
करो
कि
इश्क़
नहीं
दोस्ती
करो
Ankit gupta
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तुम्हारे
साथ
हर
रस्ता
हसीं
था
तुम्हारे
बाद
केवल
ठोकरें
हैं
Ankit gupta
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तुम्हें
नफ़रत
हमीं
से
हो
रही
है
हमीं
हैं
चाहने
वाले
तुम्हारे
Ankit gupta
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अरे
कैसों
के
आगे
रो
रहे
हो
अमाँ
बहरों
के
आगे
रो
रहे
हो
ज़रा
कहने
से
पहले
हाल
जानो
वो
जो
रोतों
के
आगे
रो
रहे
हो
वकालत
सच
की
तुम
तो
कर
रहे
हो
मगर
झूठों
के
आगे
रो
रहे
हो
यही
जीवन
का
अंतिम
सत्य
भी
है
तो
क्यूँ
लाशों
के
आगे
रो
रहे
हो
चले
आए
हो
तो
अर्ज़ी
लगा
लो
मगर
भूखों
के
आगे
रो
रहे
हो
इसे
जब
हाथ
का
ही
मैल
समझा
तो
क्यूँ
पैसों
के
आगे
रो
रहे
हो
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Ankit gupta
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