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Yogendra Singh Raghuwanshi
tum mere dil men aur main bas tum men gum
tum mere dil men aur main bas tum men gum | तुम मेरे दिल में और मैं बस तुम में गुम
- Yogendra Singh Raghuwanshi
तुम
मेरे
दिल
में
और
मैं
बस
तुम
में
गुम
अक्सर
छत
पर
साथ
टहलते
हैं
हम
तुम
- Yogendra Singh Raghuwanshi
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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ये
कहते
हो
तिरे
जाने
से
दिल
को
चैन
आएगा
तो
जाता
हूँ,
ख़ुदा
हाफ़िज़!
मगर
तुम
झूठ
कहते
हो
Zubair Ali Tabish
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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मसअला
फिर
वही
बे-घर
हुए
लोगों
का
है
हम
सभी
दिल
से
निकाले
कहाँ
तक
जाएँगे
Neeraj Neer
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हम
लबों
से
कह
न
पाए
उन
से
हाल-ए-दिल
कभी
और
वो
समझे
नहीं
ये
ख़ामुशी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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न
तेरे
आने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
न
दिल
लगाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
क़सम
ख़ुदा
की
बताता
हूँ
राज़
ये
तुमको
नहारी
खाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
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Paplu Lucknawi
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निभेगी
किस
तरह
दिल
सोचता
है
अजब
लड़की
है
जब
देखो
ख़फ़ा
है
Fuzail Jafri
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इतनी
सारी
यादों
के
होते
भी
जब
दिल
में
वीरानी
होती
है
तो
हैरानी
होती
है
Afzal Khan
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आप
चाहें
तो
कहीं
और
भी
रह
सकते
हैं
दिल
हमारा
है
तो
मर्ज़ी
भी
हमारी
होगी
Shamsul Hasan ShamS
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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तेरे
हाथों
में
कंगन
बना
झूम
लूँ
तेरी
नज़रों
में
सारा
जहाँ
घूम
लूँ
प्रेम
में
तेरे
अधरों
को
क्या
चूमना
तेरे
मेहँदी
लगे
कर
कमल
चूम
लूँ
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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होंठों
पर
इक
बात
छुपाकर
रक्खी
है
प्रिया
नेह
बरसात
छुपाकर
रक्खी
है
जिस
रैना
में
स्वप्न
मिलन
के
देखे
थे
वो
काजल
सी
रात
छुपाकर
रक्खी
है
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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है
नहीं
मंजूर
जीना
बिन
तुम्हारे
मैं
तुम्हारे
साथ
जीना
चाहता
हूँ
तोड़
कर
सारी
रिवाजें
सारी
रस्में
मैं
तुम्हारे
पाँव
छूना
चाहता
हूँ
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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तेरी
अपनी
क़िस्मत
है
और
मेरी
अपनी
किस्मत
है
तुझको
तो
संसार
मिला
पर
मुझको
तू
भी
न
मिल
पाया
Yogendra Singh Raghuwanshi
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साथ
तेरे
और
चल
सकता
नहीं
राख
हूँ
अब
और
जल
सकता
नहीं
आँधियाँ
आएँ
कि
अब
तूफ़ाँ
चलें
राह
अपनी
मैं
बदल
सकता
नहीं
थक
गया
हूँ
बेसबब
चलते
हुए
इश्क़
में
अब
और
चल
सकता
नहीं
जिस्म
की
बेताबियों
से
मात
खा
रूह
को
अब
और
छल
सकता
नहीं
छोड़
दूँगा
ये
जहाँ
तेरे
लिए
अब
तुझे
मैं
और
खल
सकता
नहीं
कब
तलक
पानी
से
मैं
डरता
रहूँ
बर्फ़
हूँ
पर
और
गल
सकता
नहीं
रात
से
मैं
दोस्ती
कैसे
करूँँ
सूर्य
हूँ
अब
और
ढल
सकता
नहीं
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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